UP में ग्रामीणों ने खुद बना डाला पुल: फिर जागा सिस्टम ! अब 27 करोड़ से होगा निर्माण, 40 सालों से थी मांग
फतेहपुर के कृपालपुर बिंधा गांव में रिंद नदी पार करने की मजबूरी से परेशान ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर लकड़ी का पुल बना दिया. इस अनोखे प्रयास ने प्रशासन और शासन को झकझोर दिया. अब सेतु निगम ने यहां 27 करोड़ रुपये की लागत से पक्का पुल बनाने की मंजूरी दे दी है, जिसका निर्माण वर्ष 2028 तक पूरा होने की उम्मीद है.
Fatehpur News: उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में एक गांव ने वह कर दिखाया, जो वर्षों तक सरकारें नहीं कर सकीं. रिंद नदी पार करने के लिए हर दिन जान जोखिम में डालने को मजबूर ग्रामीणों ने इंतजार छोड़ खुद लकड़ी का पुल तैयार कर दिया. गांव वालों का यह संघर्ष सिर्फ आवागमन की लड़ाई नहीं था, बल्कि उस सिस्टम पर करारा तमाचा था जो चार दशक तक उनकी मांग को अनसुना करता रहा. अब इसी संघर्ष ने शासन की नींद तोड़ी है और गांव को 27 करोड़ रुपये का पक्का पुल मिलने जा रहा है.
40 साल से पुल की मांग, हर मौसम में जान हथेली पर
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बिंदकी तहसील क्षेत्र के देवमई ब्लॉक स्थित कृपालपुर बिंधा गांव के किनारे बहने वाली रिंद नदी वर्षों से ग्रामीणों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई थी. करीब पांच हजार की आबादी वाले इस गांव के लोग गर्मियों में किसी तरह पैदल नदी पार कर लेते थे, लेकिन बारिश और सर्दियों में हालात बेहद खतरनाक हो जाते थे. नदी का जलस्तर बढ़ने पर इसका पाट करीब 125 मीटर तक फैल जाता था और तब नाव ही एकमात्र सहारा बचती थी.
ग्रामीणों को दैनिक काम, बाजार, अस्पताल, स्कूल और ब्लॉक मुख्यालय तक पहुंचने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता था. कई बार तेज बहाव और खराब मौसम के कारण हादसों का डर बना रहता था. गांव के लोग वर्षों से पक्के पुल की मांग कर रहे थे, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला. धीरे-धीरे ग्रामीणों का भरोसा सिस्टम से उठने लगा और आखिरकार उन्होंने खुद रास्ता निकालने का फैसला कर लिया.
लल्लू निषाद और कलावती के विचार ने बदल दी गांव की तस्वीर
ग्रामीणों ने अपनी क्षमता के अनुसार लकड़ी, लोहे के तार, सीमेंट और लोहे के खंभों की व्यवस्था की. इसके बाद नदी के भीतर खंभे गाड़कर पुल निर्माण का काम शुरू हुआ. करीब दो महीने तक लगातार मेहनत के बाद 30 जून 2025 को पुल तैयार हो गया. पुल बनने के बाद गांव में खुशी का माहौल था और लोगों ने उसी दिन से इसका इस्तेमाल भी शुरू कर दिया. ग्रामीणों को लगा कि अब उनकी जिंदगी आसान हो जाएगी और बच्चों को स्कूल जाने में खतरा नहीं उठाना पड़ेगा.
प्रशासन ने पुल को असुरक्षित बताकर रुकवाया आवागमन
लकड़ी का पुल बनने की खबर प्रशासन तक पहुंची तो अधिकारियों ने इसे असुरक्षित बताते हुए पुल पर आवाजाही रोक दी. प्रशासन ने वहां दो नाव लगवाईं और बाद में लकड़ी के पुल को हटवा दिया. लेकिन तब तक यह मामला पूरे जिले और फिर प्रदेश में चर्चा का विषय बन चुका था.
ग्रामीणों का सवाल साफ था कि जब सरकारें 40 साल तक पुल नहीं बना सकीं, तब गांव वालों ने अपनी जान बचाने के लिए खुद पुल बना लिया तो उसे भी क्यों तोड़ा गया. मामला राजनीतिक गलियारों तक पहुंच गया. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे को उठाया और सरकार पर सवाल खड़े किए. इसके बाद प्रशासन और शासन दोनों पर दबाव बढ़ने लगा. आखिरकार सेतु निगम की टीम को मौके पर भेजा गया और ग्रामीणों की मांग को जायज माना गया.
छात्रों से लेकर किसानों तक, हर दिन नाव पर टिकी थी जिंदगी
कृपालपुर बिंधा गांव ही नहीं, आसपास के कई गांवों के लोग भी इसी रास्ते से बकेवर और देवमई ब्लॉक मुख्यालय तक पहुंचते हैं. हर दिन करीब दो सौ लोग नाव से नदी पार करते थे, जिनमें बड़ी संख्या छात्रों की होती थी. स्कूल और कॉलेज जाने वाले छात्रों को हर महीने नाव का किराया देना पड़ता था.
नाव चालक प्रति छात्र लगभग पांच सौ रुपये मासिक शुल्क लेता था. वहीं खेती-किसानी के काम के लिए आने-जाने वाले ग्रामीणों को साल में एक बार 40 किलो अनाज देना पड़ता था. बाइक पार कराने के लिए 20 रुपये और साइकिल के लिए 10 रुपये अलग से देने पड़ते थे. गांव के मलखान निषाद वर्षों से नाव चला रहे हैं और यही गांव वालों का एकमात्र सहारा था. लेकिन बरसात में तेज बहाव के दौरान नदी पार करना किसी खतरे से कम नहीं होता था.
सामाजिक कार्यकर्ता ने उठाई आवाज, फिर शासन तक पहुंचा मामला
ग्रामीणों द्वारा बनाए गए लकड़ी के पुल की चर्चा तब तेजी से फैली जब सामाजिक कार्यकर्ता रोहित उमराव ने इसे सार्वजनिक किया. उन्होंने इसे सिस्टम की नाकामी का सबसे बड़ा उदाहरण बताया. 30 जुलाई 2025 को यह मामला मीडिया और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ. इसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे.
15 सितंबर 2025 को सेतु निगम की टीम सर्वे के लिए गांव पहुंची. अधिकारियों ने निरीक्षण के बाद माना कि यहां पुल की बेहद जरूरत है. इसके बाद पुल निर्माण को स्वीकृति मिल गई.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सेतु निगम के उप परियोजना प्रबंधक एसपी सिंह ने कहा कि, रिंद नदी पर कृपालपुर बिंधा गांव के पास बनने वाले पुल के लिए 27 करोड़ रुपये मंजूर हो चुके हैं. मिट्टी परीक्षण का काम भी पूरा हो चुका है और जल्द निर्माण कार्य शुरू होने की संभावना है. यह पुल वर्ष 2028 तक बनकर तैयार होगा.
ग्रामीणों की जिद ने बदल दी तकदीर, अब उम्मीदों का नया रास्ता
आज भी रिंद नदी में वे लोहे और लकड़ी के खंभे खड़े हैं, जिन पर कभी ग्रामीणों ने अपने सपनों का पुल बनाया था. ये खंभे सिर्फ लकड़ी और लोहे के ढांचे नहीं, बल्कि उस संघर्ष की निशानी हैं जिसने सिस्टम को झुकने पर मजबूर कर दिया.
कृपालपुर बिंधा गांव के लोगों ने यह साबित कर दिया कि जब समस्याएं हद से गुजर जाती हैं तो आम लोग खुद बदलाव की शुरुआत कर देते हैं. अब गांव वालों को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में उनके बच्चों को नाव के सहारे जान जोखिम में डालकर नदी पार नहीं करनी पड़ेगी. यह कहानी सिर्फ एक पुल की नहीं, बल्कि उस जज्बे की है जिसने वर्षों की उपेक्षा को चुनौती देकर विकास का रास्ता खोल दिया.
UP में ग्रामीणों ने खुद बना डाला पुल: फिर जागा सिस्टम ! अब 27 करोड़ से होगा निर्माण, 40 सालों से थी मांग
Fatehpur News: उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में एक गांव ने वह कर दिखाया, जो वर्षों तक सरकारें नहीं कर सकीं. रिंद नदी पार करने के लिए हर दिन जान जोखिम में डालने को मजबूर ग्रामीणों ने इंतजार छोड़ खुद लकड़ी का पुल तैयार कर दिया. गांव वालों का यह संघर्ष सिर्फ आवागमन की लड़ाई नहीं था, बल्कि उस सिस्टम पर करारा तमाचा था जो चार दशक तक उनकी मांग को अनसुना करता रहा. अब इसी संघर्ष ने शासन की नींद तोड़ी है और गांव को 27 करोड़ रुपये का पक्का पुल मिलने जा रहा है.
40 साल से पुल की मांग, हर मौसम में जान हथेली पर
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बिंदकी तहसील क्षेत्र के देवमई ब्लॉक स्थित कृपालपुर बिंधा गांव के किनारे बहने वाली रिंद नदी वर्षों से ग्रामीणों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई थी. करीब पांच हजार की आबादी वाले इस गांव के लोग गर्मियों में किसी तरह पैदल नदी पार कर लेते थे, लेकिन बारिश और सर्दियों में हालात बेहद खतरनाक हो जाते थे. नदी का जलस्तर बढ़ने पर इसका पाट करीब 125 मीटर तक फैल जाता था और तब नाव ही एकमात्र सहारा बचती थी.
ग्रामीणों को दैनिक काम, बाजार, अस्पताल, स्कूल और ब्लॉक मुख्यालय तक पहुंचने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता था. कई बार तेज बहाव और खराब मौसम के कारण हादसों का डर बना रहता था. गांव के लोग वर्षों से पक्के पुल की मांग कर रहे थे, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला. धीरे-धीरे ग्रामीणों का भरोसा सिस्टम से उठने लगा और आखिरकार उन्होंने खुद रास्ता निकालने का फैसला कर लिया.
लल्लू निषाद और कलावती के विचार ने बदल दी गांव की तस्वीर
गांव के रहने वाले इंजन मिस्त्री लल्लू निषाद और उनकी पत्नी कलावती ने सबसे पहले यह सवाल उठाया कि आखिर कब तक गांव वाले नाव के भरोसे जिंदगी जीते रहेंगे. इसी सोच ने लकड़ी का पुल बनाने का विचार जन्म दिया. लल्लू निषाद ने ग्रामीणों के साथ बैठकर पुल की डिजाइन तैयार की और फिर गांव में चंदा जुटाने का अभियान शुरू हुआ.
ग्रामीणों ने अपनी क्षमता के अनुसार लकड़ी, लोहे के तार, सीमेंट और लोहे के खंभों की व्यवस्था की. इसके बाद नदी के भीतर खंभे गाड़कर पुल निर्माण का काम शुरू हुआ. करीब दो महीने तक लगातार मेहनत के बाद 30 जून 2025 को पुल तैयार हो गया. पुल बनने के बाद गांव में खुशी का माहौल था और लोगों ने उसी दिन से इसका इस्तेमाल भी शुरू कर दिया. ग्रामीणों को लगा कि अब उनकी जिंदगी आसान हो जाएगी और बच्चों को स्कूल जाने में खतरा नहीं उठाना पड़ेगा.
प्रशासन ने पुल को असुरक्षित बताकर रुकवाया आवागमन
लकड़ी का पुल बनने की खबर प्रशासन तक पहुंची तो अधिकारियों ने इसे असुरक्षित बताते हुए पुल पर आवाजाही रोक दी. प्रशासन ने वहां दो नाव लगवाईं और बाद में लकड़ी के पुल को हटवा दिया. लेकिन तब तक यह मामला पूरे जिले और फिर प्रदेश में चर्चा का विषय बन चुका था.
ग्रामीणों का सवाल साफ था कि जब सरकारें 40 साल तक पुल नहीं बना सकीं, तब गांव वालों ने अपनी जान बचाने के लिए खुद पुल बना लिया तो उसे भी क्यों तोड़ा गया. मामला राजनीतिक गलियारों तक पहुंच गया. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे को उठाया और सरकार पर सवाल खड़े किए. इसके बाद प्रशासन और शासन दोनों पर दबाव बढ़ने लगा. आखिरकार सेतु निगम की टीम को मौके पर भेजा गया और ग्रामीणों की मांग को जायज माना गया.
छात्रों से लेकर किसानों तक, हर दिन नाव पर टिकी थी जिंदगी
कृपालपुर बिंधा गांव ही नहीं, आसपास के कई गांवों के लोग भी इसी रास्ते से बकेवर और देवमई ब्लॉक मुख्यालय तक पहुंचते हैं. हर दिन करीब दो सौ लोग नाव से नदी पार करते थे, जिनमें बड़ी संख्या छात्रों की होती थी. स्कूल और कॉलेज जाने वाले छात्रों को हर महीने नाव का किराया देना पड़ता था.
नाव चालक प्रति छात्र लगभग पांच सौ रुपये मासिक शुल्क लेता था. वहीं खेती-किसानी के काम के लिए आने-जाने वाले ग्रामीणों को साल में एक बार 40 किलो अनाज देना पड़ता था. बाइक पार कराने के लिए 20 रुपये और साइकिल के लिए 10 रुपये अलग से देने पड़ते थे. गांव के मलखान निषाद वर्षों से नाव चला रहे हैं और यही गांव वालों का एकमात्र सहारा था. लेकिन बरसात में तेज बहाव के दौरान नदी पार करना किसी खतरे से कम नहीं होता था.
सामाजिक कार्यकर्ता ने उठाई आवाज, फिर शासन तक पहुंचा मामला
ग्रामीणों द्वारा बनाए गए लकड़ी के पुल की चर्चा तब तेजी से फैली जब सामाजिक कार्यकर्ता रोहित उमराव ने इसे सार्वजनिक किया. उन्होंने इसे सिस्टम की नाकामी का सबसे बड़ा उदाहरण बताया. 30 जुलाई 2025 को यह मामला मीडिया और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ. इसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे.
15 सितंबर 2025 को सेतु निगम की टीम सर्वे के लिए गांव पहुंची. अधिकारियों ने निरीक्षण के बाद माना कि यहां पुल की बेहद जरूरत है. इसके बाद पुल निर्माण को स्वीकृति मिल गई.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सेतु निगम के उप परियोजना प्रबंधक एसपी सिंह ने कहा कि, रिंद नदी पर कृपालपुर बिंधा गांव के पास बनने वाले पुल के लिए 27 करोड़ रुपये मंजूर हो चुके हैं. मिट्टी परीक्षण का काम भी पूरा हो चुका है और जल्द निर्माण कार्य शुरू होने की संभावना है. यह पुल वर्ष 2028 तक बनकर तैयार होगा.
ग्रामीणों की जिद ने बदल दी तकदीर, अब उम्मीदों का नया रास्ता
आज भी रिंद नदी में वे लोहे और लकड़ी के खंभे खड़े हैं, जिन पर कभी ग्रामीणों ने अपने सपनों का पुल बनाया था. ये खंभे सिर्फ लकड़ी और लोहे के ढांचे नहीं, बल्कि उस संघर्ष की निशानी हैं जिसने सिस्टम को झुकने पर मजबूर कर दिया.
कृपालपुर बिंधा गांव के लोगों ने यह साबित कर दिया कि जब समस्याएं हद से गुजर जाती हैं तो आम लोग खुद बदलाव की शुरुआत कर देते हैं. अब गांव वालों को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में उनके बच्चों को नाव के सहारे जान जोखिम में डालकर नदी पार नहीं करनी पड़ेगी. यह कहानी सिर्फ एक पुल की नहीं, बल्कि उस जज्बे की है जिसने वर्षों की उपेक्षा को चुनौती देकर विकास का रास्ता खोल दिया.