Fatehpur News: लोकतंत्र सेनानी विजय अग्निहोत्री का निधन, संघर्ष और विचार की एक पूरी पीढ़ी का मौन अवसान
लोकतंत्र सेनानी विजय अग्निहोत्री के निधन ने समाजवादी आंदोलन की संघर्षशील विरासत को गहरा आघात पहुंचाया है. वरिष्ठ समाजवादी संतोष द्विवेदी ने इसे केवल एक व्यक्ति की नहीं बल्कि विचार, त्याग और आंदोलनों की पूरी संस्कृति की विदाई बताया है.
Fatehpur/Kanpur News: बीते गुरुवार समाजवादी आंदोलन की एक और चमकदार स्मृति हमारे बीच से चली गई. लोकतंत्र सेनानी विजय अग्निहोत्री (75) के निधन ने मुझे भीतर तक विचलित कर दिया. यह केवल एक साथी का जाना नहीं है, बल्कि उस दौर का अंत है जहां राजनीति संघर्ष, त्याग और लोकतंत्र की रक्षा का पर्याय हुआ करती थी. पढ़ें वशिष्ठ समाजवादी संतोष द्विवेदी ने उनके निधन पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं.
संघर्ष और बलिदान की विरासत में जन्मा एक नाम
फतेहपुर के रेवाड़ी गांव के मूल रूप से रहने वाले विजय अग्निहोत्री केवल एक व्यक्ति नहीं थे, वह एक विरासत थे. वो लंबे समय से कानपुर के डिप्टी पड़ाव में रह रहे थे वो एक सहायक शासकीय अधिकवक्ता भी रह चुके हैं. संघर्ष और बलिदानों की संस्कृति उन्हें जन्म से ही मिली थी. शायद ही देश में कोई ऐसा परिवार होगा जहां तीन सगे भाई स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े हों. उनके पिता श्री देवी दत्त अग्निहोत्री अपने दोनों भाइयों शम्भू दयाल और देवीदयाल के साथ आजादी की लड़ाई में शामिल हुए. तीनों को आजीवन कारावास की सजा मिली और वे स्वतंत्रता के बाद ही जेल से बाहर आ सके. यही संस्कार विजय अग्निहोत्री के रक्त में उतरे और वही उन्हें लोकतंत्र के संकट के समय जेल की सीखचों तक ले गए.
आपातकाल में लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प
जब देश पर आपातकाल का अंधकार छाया, तब बहुत से लोग खामोश हो गए. लेकिन विजय अग्निहोत्री उन लोगों में थे जिन्होंने चुप रहना स्वीकार नहीं किया. स्वतंत्रता सेनानी के खून ने उन्हें लोकतंत्र सेनानी बना दिया. जेल जाना उनके लिए कोई मजबूरी नहीं बल्कि एक स्वाभाविक निर्णय था. सत्ता के दमन के सामने खड़े रहना उन्होंने अपने जीवन का कर्तव्य माना. ऐसे लोग इतिहास की किताबों में कम और जनमानस की स्मृति में अधिक जीवित रहते हैं.
समाजवादी आंदोलन का वह दौर जो अब स्मृति बनता जा रहा है
कार्पोरेट कल्चर और सिमटती राजनीति पर गहरी चिंता
आज पूरी की पूरी संघर्ष संस्कृति का स्थान कार्पोरेट कल्चर ने ले लिया है. राजनीति अब विचार नहीं, प्रबंधन बनती जा रही है. छात्रसंघों और मजदूर संगठनों को समाप्त कर दिया गया ताकि तंत्र और लोक का रिश्ता टूट जाए. राजनीति कुछ परिवारों, कुछ घरानों और कुछ वर्गों की चौखट तक सीमित हो जाए. हम जितना लिख और बोल रहे हैं, उससे कहीं अधिक समझते हैं. लेकिन उससे भी अधिक चिंता इस बात की है कि हम सब मौन हैं.
समाप्त होती पीढ़ी और भविष्य की बेचैनी
सबसे भयावह सच यह है कि संघर्षों से निकली पूरी की पूरी पीढ़ी एक एक करके समाप्त होती जा रही है. बहुत जल्द ऐसा समय आएगा जब आने वाली पीढ़ी को यह बताने वाला भी कोई नहीं बचेगा कि कभी हालात ऐसे नहीं थे. यह विचार मुझे भीतर तक विचलित करता है. मुझे उम्मीद है कि यह स्थिति आपको भी चिंतित करती होगी. सवाल यह है कि क्या हम कुछ पहल कर सकते हैं. क्या कहीं बैठकर विचार किया जा सकता है.
एक संयुक्त चिंतन की आवश्यकता और विजय अग्निहोत्री की स्मृति
हमारी इच्छा है कि कानपुर में आंदोलन के युग से निकले सभी नेता, चाहे वे किसी भी दल में हों, एक साथ बैठें. अतीत और भविष्य के इस अवांछित परिदृश्य पर गंभीर चिंतन हो. माना कि मौसम प्रतिकूल है और निराशा गहरी है, लेकिन ठहरे हुए पानी में एक कंकड़ ही सही, मारकर तो देखा जाए. यह विचार हमें विद्यार्थी परिषद से जुड़े नेता गया प्रसाद जायसवाल ने दिया और कौशल किशोर शर्मा ने भी सहमति जताई. विजय अग्निहोत्री की स्मृति शायद हमें यह साहस दे सके.
Fatehpur News: लोकतंत्र सेनानी विजय अग्निहोत्री का निधन, संघर्ष और विचार की एक पूरी पीढ़ी का मौन अवसान
Fatehpur/Kanpur News: बीते गुरुवार समाजवादी आंदोलन की एक और चमकदार स्मृति हमारे बीच से चली गई. लोकतंत्र सेनानी विजय अग्निहोत्री (75) के निधन ने मुझे भीतर तक विचलित कर दिया. यह केवल एक साथी का जाना नहीं है, बल्कि उस दौर का अंत है जहां राजनीति संघर्ष, त्याग और लोकतंत्र की रक्षा का पर्याय हुआ करती थी. पढ़ें वशिष्ठ समाजवादी संतोष द्विवेदी ने उनके निधन पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं.
संघर्ष और बलिदान की विरासत में जन्मा एक नाम
फतेहपुर के रेवाड़ी गांव के मूल रूप से रहने वाले विजय अग्निहोत्री केवल एक व्यक्ति नहीं थे, वह एक विरासत थे. वो लंबे समय से कानपुर के डिप्टी पड़ाव में रह रहे थे वो एक सहायक शासकीय अधिकवक्ता भी रह चुके हैं. संघर्ष और बलिदानों की संस्कृति उन्हें जन्म से ही मिली थी. शायद ही देश में कोई ऐसा परिवार होगा जहां तीन सगे भाई स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े हों. उनके पिता श्री देवी दत्त अग्निहोत्री अपने दोनों भाइयों शम्भू दयाल और देवीदयाल के साथ आजादी की लड़ाई में शामिल हुए. तीनों को आजीवन कारावास की सजा मिली और वे स्वतंत्रता के बाद ही जेल से बाहर आ सके. यही संस्कार विजय अग्निहोत्री के रक्त में उतरे और वही उन्हें लोकतंत्र के संकट के समय जेल की सीखचों तक ले गए.
आपातकाल में लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प
जब देश पर आपातकाल का अंधकार छाया, तब बहुत से लोग खामोश हो गए. लेकिन विजय अग्निहोत्री उन लोगों में थे जिन्होंने चुप रहना स्वीकार नहीं किया. स्वतंत्रता सेनानी के खून ने उन्हें लोकतंत्र सेनानी बना दिया. जेल जाना उनके लिए कोई मजबूरी नहीं बल्कि एक स्वाभाविक निर्णय था. सत्ता के दमन के सामने खड़े रहना उन्होंने अपने जीवन का कर्तव्य माना. ऐसे लोग इतिहास की किताबों में कम और जनमानस की स्मृति में अधिक जीवित रहते हैं.
समाजवादी आंदोलन का वह दौर जो अब स्मृति बनता जा रहा है
विजय अग्निहोत्री समाजवादी आंदोलन के उस युग के प्रतिनिधि थे जब राजनीति आंदोलनों से जन्म लेती थी. छात्रसंघ, मजदूर संगठन और जनसंघर्ष वह प्रयोगशालाएं थीं जहां से नेतृत्व निकलता था. आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो भयभीत हो जाता हूं. वह धारा टूट गई है. पानी ठहर गया है. त्याग और बलिदान की धरती से उठने वाली सुगंध की जगह अब बदबूदार हवाएं बह रही हैं. यह बदलाव स्वाभाविक नहीं बल्कि योजनाबद्ध प्रतीत होता है.
कार्पोरेट कल्चर और सिमटती राजनीति पर गहरी चिंता
आज पूरी की पूरी संघर्ष संस्कृति का स्थान कार्पोरेट कल्चर ने ले लिया है. राजनीति अब विचार नहीं, प्रबंधन बनती जा रही है. छात्रसंघों और मजदूर संगठनों को समाप्त कर दिया गया ताकि तंत्र और लोक का रिश्ता टूट जाए. राजनीति कुछ परिवारों, कुछ घरानों और कुछ वर्गों की चौखट तक सीमित हो जाए. हम जितना लिख और बोल रहे हैं, उससे कहीं अधिक समझते हैं. लेकिन उससे भी अधिक चिंता इस बात की है कि हम सब मौन हैं.
समाप्त होती पीढ़ी और भविष्य की बेचैनी
सबसे भयावह सच यह है कि संघर्षों से निकली पूरी की पूरी पीढ़ी एक एक करके समाप्त होती जा रही है. बहुत जल्द ऐसा समय आएगा जब आने वाली पीढ़ी को यह बताने वाला भी कोई नहीं बचेगा कि कभी हालात ऐसे नहीं थे. यह विचार मुझे भीतर तक विचलित करता है. मुझे उम्मीद है कि यह स्थिति आपको भी चिंतित करती होगी. सवाल यह है कि क्या हम कुछ पहल कर सकते हैं. क्या कहीं बैठकर विचार किया जा सकता है.
एक संयुक्त चिंतन की आवश्यकता और विजय अग्निहोत्री की स्मृति
हमारी इच्छा है कि कानपुर में आंदोलन के युग से निकले सभी नेता, चाहे वे किसी भी दल में हों, एक साथ बैठें. अतीत और भविष्य के इस अवांछित परिदृश्य पर गंभीर चिंतन हो. माना कि मौसम प्रतिकूल है और निराशा गहरी है, लेकिन ठहरे हुए पानी में एक कंकड़ ही सही, मारकर तो देखा जाए. यह विचार हमें विद्यार्थी परिषद से जुड़े नेता गया प्रसाद जायसवाल ने दिया और कौशल किशोर शर्मा ने भी सहमति जताई. विजय अग्निहोत्री की स्मृति शायद हमें यह साहस दे सके.