
Uttar Pradesh: फतेहपुर मंदिर-मकबरा विवाद में मुस्लिम पक्ष को बड़ा झटका ! अब इस तारीख को होगी सुनवाई
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के आबूनगर रेडइया स्थित बहुचर्चित मंदिर-मकबरा विवाद में मुस्लिम पक्ष को अदालत से बड़ा झटका लगा है. एडीजे प्रथम की अदालत ने रेस्टोरेशन अपील खारिज कर दी है. अब मामले की सुनवाई मूल वाद पर जारी रहेगी. इस बहुचर्चित विवाद की अगली सुनवाई 13 सितंबर को सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत में होगी.
Fatehpur News: फतेहपुर जिले के आबूनगर रेडइया स्थित बहुचर्चित मंदिर-मकबरा विवाद में अदालत से अहम फैसला सामने आया है. एडीजे प्रथम राजकिशोर की अदालत ने मुस्लिम पक्ष की रेस्टोरेशन अपील खारिज करते हुए साफ कर दिया है कि मुकदमे की सुनवाई अब मूल वाद पर ही जारी रहेगी. अदालत के इस फैसले के बाद इस संवेदनशील मामले में दोनों पक्षों की निगाहें 13 सितंबर पर टिक गई हैं, जब सिविल जज सीनियर डिवीजन आकांक्षा मिश्रा की अदालत में अगली सुनवाई होगी.
रेस्टोरेशन अपील पर मुस्लिम पक्ष को नहीं मिली राहत
वादी पक्ष के अधिवक्ता रामजी सहाय ने बताया कि वर्ष 2010 में सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत ने राम नरेश सिंह (असोथर परिवार) के मालिकाना हक के दावे को खारिज करते हुए विवादित भूमि को मकबरा मंगी के नाम दर्ज करने का आदेश दिया था. वादी पक्ष का कहना है कि यह फैसला एकतरफा था, क्योंकि उस समय उनके पक्ष को सुना ही नहीं गया था.

दोनों पक्षों की दलीलों के बाद आया अदालत का फैसला
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि वादी पक्ष जुर्माना अदा कर चुका है, इसलिए उसे मुकदमे में अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए. ऐसे में प्रतिवादी की अपील स्वीकार किए जाने का कोई आधार नहीं बनता.
क्या है वादी पक्ष का दावा?
मुख्य पैरोकार विजय प्रताप सिंह का दावा है कि विवादित स्थल पर हजारों वर्ष पुराना ठाकुर जी (भगवान श्रीकृष्ण और भगवान शिव) का प्राचीन मंदिर मौजूद है. उनका कहना है कि पुराने राजस्व अभिलेखों में यह स्थल मंदिर के रूप में दर्ज था.
इसके अलावा भवन के गुंबद पर आज भी कमल की पंखुड़ियां, कलश और घंटी की आकृतियां मौजूद हैं, जो मंदिर की प्राचीनता की तस्दीक करती हैं. वादी पक्ष का यह भी कहना है कि उनके पिता राम नरेश सिंह ने वर्ष 1970 में मानसिंह परिवार से यह जमीन विधिवत बैनामे के जरिए खरीदी थी.
प्रतिवादी पक्ष का क्या है दावा?
मुस्लिम पक्ष और मुतवल्ली मोहम्मद अनीस का कहना है कि यह स्थल नवाब अब्दुल समद और उनके पुत्र अबू मोहम्मद का लगभग 300 से 500 वर्ष पुराना ऐतिहासिक मकबरा है. उनका दावा है कि सरकारी राजस्व दस्तावेजों में यह जमीन हमेशा से मकबरा मंगी के नाम दर्ज रही है. इसी आधार पर उनका कहना है कि विवादित स्थल पर उनका दावा कानूनी रूप से मजबूत है.
Uttar Pradesh: फतेहपुर मंदिर-मकबरा विवाद में मुस्लिम पक्ष को बड़ा झटका ! अब इस तारीख को होगी सुनवाई
Fatehpur News: फतेहपुर जिले के आबूनगर रेडइया स्थित बहुचर्चित मंदिर-मकबरा विवाद में अदालत से अहम फैसला सामने आया है. एडीजे प्रथम राजकिशोर की अदालत ने मुस्लिम पक्ष की रेस्टोरेशन अपील खारिज करते हुए साफ कर दिया है कि मुकदमे की सुनवाई अब मूल वाद पर ही जारी रहेगी. अदालत के इस फैसले के बाद इस संवेदनशील मामले में दोनों पक्षों की निगाहें 13 सितंबर पर टिक गई हैं, जब सिविल जज सीनियर डिवीजन आकांक्षा मिश्रा की अदालत में अगली सुनवाई होगी.
रेस्टोरेशन अपील पर मुस्लिम पक्ष को नहीं मिली राहत
वादी पक्ष के अधिवक्ता रामजी सहाय ने बताया कि वर्ष 2010 में सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत ने राम नरेश सिंह (असोथर परिवार) के मालिकाना हक के दावे को खारिज करते हुए विवादित भूमि को मकबरा मंगी के नाम दर्ज करने का आदेश दिया था. वादी पक्ष का कहना है कि यह फैसला एकतरफा था, क्योंकि उस समय उनके पक्ष को सुना ही नहीं गया था.
इसके बाद वादी पक्ष ने रेस्टोरेशन अर्जी दाखिल कर खुद को मुकदमे में पक्षकार बनाए जाने की मांग की. अदालत ने पांच हजार रुपये का जुर्माना लगाते हुए रेस्टोरेशन प्रार्थना पत्र स्वीकार किया और मूल वाद की सुनवाई जारी रखने का आदेश दिया.
दोनों पक्षों की दलीलों के बाद आया अदालत का फैसला
रेस्टोरेशन आदेश के खिलाफ मुस्लिम पक्ष ने जिला जज की अदालत में अपील दाखिल की थी, जिसे बाद में एडीजे प्रथम की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया. अधिवक्ता रामजी सहाय के मुताबिक 27 जुलाई को दोनों पक्षों ने अदालत के सामने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं. इसके बाद 4 अगस्त को अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए मुस्लिम पक्ष की अपील खारिज कर दी.
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि वादी पक्ष जुर्माना अदा कर चुका है, इसलिए उसे मुकदमे में अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए. ऐसे में प्रतिवादी की अपील स्वीकार किए जाने का कोई आधार नहीं बनता.
क्या है वादी पक्ष का दावा?
मुख्य पैरोकार विजय प्रताप सिंह का दावा है कि विवादित स्थल पर हजारों वर्ष पुराना ठाकुर जी (भगवान श्रीकृष्ण और भगवान शिव) का प्राचीन मंदिर मौजूद है. उनका कहना है कि पुराने राजस्व अभिलेखों में यह स्थल मंदिर के रूप में दर्ज था.
इसके अलावा भवन के गुंबद पर आज भी कमल की पंखुड़ियां, कलश और घंटी की आकृतियां मौजूद हैं, जो मंदिर की प्राचीनता की तस्दीक करती हैं. वादी पक्ष का यह भी कहना है कि उनके पिता राम नरेश सिंह ने वर्ष 1970 में मानसिंह परिवार से यह जमीन विधिवत बैनामे के जरिए खरीदी थी.
प्रतिवादी पक्ष का क्या है दावा?
मुस्लिम पक्ष और मुतवल्ली मोहम्मद अनीस का कहना है कि यह स्थल नवाब अब्दुल समद और उनके पुत्र अबू मोहम्मद का लगभग 300 से 500 वर्ष पुराना ऐतिहासिक मकबरा है. उनका दावा है कि सरकारी राजस्व दस्तावेजों में यह जमीन हमेशा से मकबरा मंगी के नाम दर्ज रही है. इसी आधार पर उनका कहना है कि विवादित स्थल पर उनका दावा कानूनी रूप से मजबूत है.