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Jageshwar Temple History: अद्भुत है जागेश्वर धाम की महिमा ! हाथी भी नहीं हिला पाया था शिवलिंग, जानिए क्या है इसका इतिहास

Jageshwar Temple History: अद्भुत है जागेश्वर धाम की महिमा ! हाथी भी नहीं हिला पाया था शिवलिंग, जानिए क्या है इसका इतिहास
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले का जागेश्वर धाम मंदिर का क्या है इतिहास: Image Credit Original Source

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के गाजीपुर-असोथर मार्ग पर स्थित प्राचीन जागेश्वर धाम सावन के महीने में आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है. सावन के प्रत्येक सोमवार यहां हजारों श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करने पहुंचते हैं. मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा, शिवलिंग की अद्भुत महिमा और भक्तों की अटूट आस्था इसे जिले के प्रमुख शिवधामों में शामिल करती है.

Jageshwar Temple History: फतेहपुर का जागेश्वर धाम सिर्फ एक प्राचीन शिव मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और चमत्कारी मान्यताओं का संगम है. सदियों पुराना यह शिवधाम अपनी अनोखी कथा के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है. मान्यता है कि यहां स्थापित शिवलिंग को हाथी तक अपनी जगह से नहीं हिला सका था. यही वजह है कि सावन और महाशिवरात्रि पर यहां श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ता है.

सावन में जागेश्वर धाम में उमड़ती है भक्तों की भारी भीड़

जिला मुख्यालय से करीब 22 किलोमीटर दूर गाजीपुर-असोथर मार्ग पर स्थित प्राचीन जागेश्वर धाम अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है. सावन के महीने में, विशेषकर सोमवार के दिन, यहां सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं. भक्त भगवान शिव का जलाभिषेक कर परिवार की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं.

स्थानीय लोगों के अलावा फतेहपुर और आसपास के कई जिलों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से भोलेनाथ की आराधना करता है, उसकी मुराद अवश्य पूरी होती है.

द्वापर युग से जुड़ी है शिवलिंग प्रकट होने की कथा

जागेश्वर धाम के इतिहास को लेकर क्षेत्र में एक प्राचीन लोककथा प्रचलित है. बताया जाता है कि द्वापर युग में यह पूरा इलाका घने जंगल से घिरा हुआ था. उस समय कुछ भेड़ पालक यहां अपनी भेड़ों को चराने आते थे. एक दिन पेड़ की डाल काटते समय जब डाल नहीं कटी तो उन्होंने अपने हंसिए की धार तेज करने के लिए पास पड़े एक पत्थर पर उसे रगड़ना शुरू किया.

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तभी उन्हें महसूस हुआ कि वह कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि शिवलिंग का दिव्य स्वरूप है. यह बात पूरे क्षेत्र में फैल गई और इसकी जानकारी तत्कालीन असोथर रियासत के राजा तक पहुंची.

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लाख कोशिशों के बाद भी हाथी नहीं हिला सका शिवलिंग

जानकारों की माने तो, असोथर के तत्कालीन राजा ने शिवलिंग को अपने राज्य में स्थापित कराने के लिए सैनिकों और हाथी को वहां भेजा. सैनिकों ने हर संभव प्रयास किया, लेकिन हाथी भी शिवलिंग को अपनी जगह से टस से मस नहीं कर सका.

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वापसी के दौरान झब्बापुर के पास हाथी की अचानक मौत हो गई. सैनिकों ने वहीं हाथी को दफना दिया और उसकी स्मृति में आम का पौधा लगाया. आज भी वहां मौजूद आम का पेड़ 'हथिया आम' के नाम से प्रसिद्ध है और इस घटना का साक्षी माना जाता है.

सन 1950 में कराया गया भव्य मंदिर का निर्माण

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार सन 1950 में बाबू गोपी साहू ने वर्तमान जागेश्वर धाम मंदिर का भव्य निर्माण कराया और विधि-विधान से शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कराई. मंदिर का ऊंचा शिखर और पारंपरिक स्थापत्य दूर से ही श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है. मंदिर परिसर का शांत वातावरण और आध्यात्मिक ऊर्जा यहां आने वाले हर भक्त को विशेष अनुभूति कराती है.

सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होने की है मान्यता

जागेश्वर धाम को लेकर लोगों में गहरी आस्था है. मान्यता है कि यहां जो भी भक्त पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामना व्यक्त करता है, भोलेनाथ उसकी इच्छा अवश्य पूरी करते हैं. यही वजह है कि पूरे वर्ष यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है.

महाशिवरात्रि पर लगता है 15 दिनों का विशाल मेला

जागेश्वर धाम में महाशिवरात्रि का पर्व विशेष महत्व रखता है. इस अवसर पर यहां 15 दिनों तक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है. मेले में फतेहपुर ही नहीं, बल्कि आसपास के कई जिलों से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं. पूजा-अर्चना के साथ धार्मिक आयोजनों और मेले का आनंद लेने के लिए दूर-दूर से लोग यहां आते हैं. सावन के पूरे महीने, विशेषकर प्रत्येक सोमवार, मंदिर परिसर 'हर-हर महादेव' के जयघोष से गूंज उठता है और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है.

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