
Fatehpur News: माल बाबू से साहित्य के शिखर तक, विधानसभा चुनाव लड़ने वाले डॉ ओपी अवस्थी का निधन, जानिए फतेहपुर की आत्मा में उनका योगदान
फतेहपुर के प्रख्यात साहित्यकार, लेखक, संपादक और विचारक डॉ ओमप्रकाश अवस्थी का 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया. रेलवे की नौकरी से लेकर हिंदी साहित्य के शिखर तक का उनका जीवन संघर्ष, साधना और फतेहपुर की सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने का अद्वितीय उदाहरण रहा.
Dr OP Awasthi Biography: फतेहपुर जिले की साहित्यिक, सांस्कृतिक और वैचारिक दुनिया सोमवार दोपहर उस समय सूनी हो गई जब प्रख्यात साहित्यकार, लेखक, संपादक और समाजवादी विचारक डॉ ओमप्रकाश अवस्थी का निधन हो गया. मौहार गांव में जन्मे और जीवन भर कटरा अब्दुलगनी मोहल्ले में रहने वाले डॉ अवस्थी ने फतेहपुर के इतिहास, पुरातत्व और साहित्य को शब्दों में अमर कर दिया. उनका जाना जनपद के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है.
मौहार से कटरा अब्दुलगनी तक, एक जीवन जो फतेहपुर बन गया

सोमवार दोपहर करीब 3 बजे, 89 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने इसी निवास पर अंतिम सांस ली. बताया गया कि वह लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे. उनके निधन की खबर फैलते ही साहित्य, शिक्षा और सामाजिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई. लोग यह मानने को विवश हैं कि डॉ अवस्थी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि फतेहपुर की जीवित स्मृति थे, जिनके जाने से इतिहास का एक चलता-फिरता अध्याय बंद हो गया.
रेलवे के माल बाबू से पीएचडी तक, शिक्षा के लिए छोड़ी नौकरी
इसके लिए उन्होंने अपना रेलवे ट्रांसफर हरियाणा के नीलोखेड़ी में करवा लिया. पीएचडी पूरी करने के बाद उन्होंने एक बड़ा और साहसिक फैसला लिया और रेलवे की सुरक्षित नौकरी छोड़ दी. इसके बाद वह फतेहपुर लौट आए और साहित्य तथा शिक्षा को ही अपना जीवन लक्ष्य बना लिया. यह निर्णय उनके जीवन की दिशा तय करने वाला साबित हुआ, जिसने आगे चलकर फतेहपुर को एक बड़ा साहित्यिक संदर्भ दिया.
महात्मा गांधी डिग्री कॉलेज से राजनीति तक
लगभग 1960 के दशक में डॉ ओपी अवस्थी ने शहर के एंग्लो संस्कृत डिग्री कॉलेज, जो वर्तमान में महात्मा गांधी डिग्री कॉलेज के नाम से जाना जाता है, में हिंदी के प्रवक्ता के रूप में अध्यापन कार्य शुरू किया. इसी दौरान उनका सामाजिक और राजनीतिक जीवन भी सक्रिय रहा. साहित्यकार डॉ चंद्र कुमार पाण्डेय के अनुसार, सन 1967 से 1969 के बीच उन्होंने बिंदकी विधानसभा क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव भी लड़ा. हालांकि चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली.
इसके बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया और अपना पूरा जीवन साहित्य, समाज और फतेहपुर के इतिहास को समर्पित कर दिया. राजनीति से हटने के बाद उनका झुकाव और भी गहराई से पुरातात्विक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक शोध की ओर हो गया, जिसने उन्हें एक साधारण शिक्षक से जनपद का इतिहासकार बना दिया.
समवाय पत्रिका से अनुकाल तक, इतिहास शब्दों में पिरोया
डॉ ओपी अवस्थी का सबसे बड़ा योगदान फतेहपुर के इतिहास और धरोहरों को लिखित रूप में संरक्षित करना रहा. सन 1972 में उन्होंने समवाय पत्रिका की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य फतेहपुर के इतिहास, पुरातात्विक धरोहरों और सांस्कृतिक विरासत को जनमानस तक पहुंचाना था. इस पत्रिका में जिले के कई लेखकों ने योगदान दिया, जबकि इसका संपादन स्वयं डॉ अवस्थी ने किया.
इसके बाद उन्होंने जिन पुस्तकों का संपादन और लेखन किया, वे आज फतेहपुर के लिए अमूल्य दस्तावेज हैं. अनुवाक पुस्तक में उन्होंने जिले के पुरातात्विक इतिहास को विस्तार से प्रस्तुत किया. अनुकाल नामक पुस्तक में फतेहपुर के साहित्य का विस्तृत वर्णन किया गया, जबकि अनुकाल का दूसरा वॉल्यूम जनपद के संपूर्ण इतिहास पर आधारित रहा.
डॉ चंद्र कुमार पाण्डेय बताते हैं कि साहित्य वाले अनुकाल में जिले भर के सभी साहित्यकारों का विस्तृत परिचय और योगदान दर्ज है जिसमें उनका भी बड़ा योगदान रहा है और उसमें डॉ अवस्थी द्वारा लिखी गई बातें आज भी पूरी तरह प्रासंगिक हैं.
आलोचना की फिसलन और नई कविता, शोध और दर्शन का संगम
डॉ ओपी अवस्थी केवल इतिहासकार या संपादक ही नहीं थे, बल्कि वह गहरे आलोचक और दार्शनिक भी थे. उनकी चर्चित थीसिस आलोचना की फिसलन पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई, जिसमें फतेहपुर के पुरातात्विक, सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्रों का अद्भुत संयोजन देखने को मिलता है.
हिंदी की नई कविता, रचना प्रक्रिया, रसवादी आलोचना और उसके दार्शनिक व सैद्धांतिक स्वरूप पर उन्होंने गहन शोध किया, जिसके लिए उन्हें डीलिट की उपाधि भी प्राप्त हुई. उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय को अपना आदर्श माना. उनके लेखन में आलोचना, इतिहास और दर्शन का ऐसा संतुलन दिखता है, जो बहुत कम साहित्यकारों में देखने को मिलता है.
समाजवादी विचार, सम्मान और संस्थागत योगदान
समाजवादी पार्टी के नेता संतोष द्विवेदी ने डॉ अवस्थी के निधन को साहित्य और विचार जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया. उन्होंने कहा कि छात्र जीवन में डॉ राममनोहर लोहिया के विचारों से डॉ अवस्थी प्रेरित रहे और गांधीवादी दर्शन को कर्म, विचार और आचरण में उतारते रहे. सक्रिय राजनीति से दूर रहते हुए भी सामाजिक, वैचारिक और शैक्षणिक गतिविधियों में उनका योगदान निरंतर बना रहा.
उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार का अज्ञेय कवि सम्मान, विश्व हिंदी सम्मेलन का सहर्षताब्दी हिंदी सेवी सम्मान और मालती साहित्य सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया. उन्होंने अपने जीवन में लगभग अस्सी शोध एवं आलोचनात्मक लेख लिखे.
प्राचार्य से संरक्षक तक, संस्थाओं में अमिट छाप
डॉ ओपी अवस्थी महात्मा गांधी महाविद्यालय फतेहपुर में वर्ष 2004 से 2007 तक अवैतनिक प्राचार्य के पद पर रहे. इसके अलावा वह अक्षय साहित्य कला केंद्र अमौली के संरक्षक, अमर शहीद ठाकुर दरियाव सिंह स्मारक समिति खागा के अध्यक्ष, खादी ग्रामोद्योग आयोग की अनुदानित संस्था जनपद सेवा संस्थान के मंत्री और कोटेश्वर इंटर कॉलेज स्मवां की प्रबंध समिति में अध्यक्ष पद पर भी रहे.
इन सभी भूमिकाओं में उन्होंने शिक्षा, साहित्य और समाज के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य किया. उनके द्वारा लिखी और संपादित कृतियों में नई कविता, आलोचना की फिसलन, अज्ञेय कवि, इलियट का काव्यशास्त्र, काव्य पुरुष अटल बिहारी बाजपेयी, समवाय, अनुवाक, अनुकाल, स्मृति शेष, विकास वर्तिका, सत्याग्रह अरु असहयोग का आल्हा, राघव रंग, हिस्ट्रियोग्राफी, डॉ राममनोहर लोहिया पर लेख और आधुनिकीकृत रस प्रमुख हैं.
