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UPPCL News: यूपी में 20 प्रतिशत तक महंगी हो सकती है बिजली, 1400 करोड़ की वसूली पर उठे सवाल, इस दिन होगा बड़ा आंदोलन

UPPCL News: यूपी में 20 प्रतिशत तक महंगी हो सकती है बिजली, 1400 करोड़ की वसूली पर उठे सवाल, इस दिन होगा बड़ा आंदोलन
क्या उत्तर प्रदेश में बिजली महंगी होने वाली है, होगा आंदोलन: Image Credit Original Source

उत्तर प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं पर महंगाई की दोहरी मार पड़ सकती है. बिजली कंपनियों ने 20 प्रतिशत तक टैरिफ बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है. स्मार्ट मीटर का खर्च भी बिल में जोड़ने की तैयारी है. 1400 करोड़ की कथित अतिरिक्त वसूली और 12 फरवरी के आंदोलन से मामला गरमा गया है.

UPPCL News: यूपी में बिजली दरों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. एक तरफ बिजली कंपनियां भारी घाटे का हवाला देकर टैरिफ बढ़ाने की तैयारी में हैं, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ताओं से कथित अतिरिक्त वसूली और निजीकरण के खिलाफ विरोध तेज हो गया है. मार्च में होने वाली सुनवाई से पहले यह मुद्दा पूरी तरह सियासी और सामाजिक बहस का केंद्र बन चुका है.

20 प्रतिशत तक टैरिफ बढ़ाने की तैयारी, मार्च में होगा अंतिम फैसला

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उत्तर प्रदेश की बिजली वितरण कंपनियों ने बिजली दरों में करीब 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी का प्रस्ताव राज्य विद्युत नियामक आयोग के सामने रखा है. कंपनियों का दावा है कि उन्हें 12,453 करोड़ रुपये से अधिक का घाटा उठाना पड़ रहा है, जिसकी भरपाई मौजूदा दरों से संभव नहीं है. आयोग ने प्रस्ताव को प्रारंभिक रूप से स्वीकार करते हुए मार्च महीने में इस पर अंतिम सुनवाई तय की है.

इससे पहले कंपनियों को निर्देश दिया गया है कि वे अपना पूरा प्रस्ताव प्रमुख अखबारों में प्रकाशित करें ताकि आम उपभोक्ता भी इसे पढ़ सकें. आयोग ने उपभोक्ताओं को 21 दिन का समय दिया है, जिसमें वे अपनी आपत्तियां और सुझाव दर्ज करा सकेंगे. यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही यह तय होगा कि बिजली कितनी महंगी होगी और किस श्रेणी के उपभोक्ताओं पर कितना भार पड़ेगा.

स्मार्ट मीटर का खर्च भी उपभोक्ताओं पर डालने की योजना

बिजली कंपनियों के प्रस्ताव का सबसे विवादित हिस्सा स्मार्ट प्रीपेड मीटर को लेकर है. कंपनियों ने कहा है कि स्मार्ट मीटर लगाने, उनके रखरखाव और संचालन पर करीब 3,837 करोड़ रुपये खर्च होंगे. इस पूरी राशि को भी बिजली दरों में शामिल करने की मांग की गई है. इसका मतलब यह है कि उपभोक्ताओं को न सिर्फ यूनिट रेट बढ़ने का सामना करना पड़ेगा, बल्कि तकनीकी बदलाव का खर्च भी उनके बिल में जुड़ जाएगा.

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उपभोक्ता परिषद और सामाजिक संगठनों का कहना है कि स्मार्ट मीटर सरकारी नीति का हिस्सा हैं, इसलिए उनका खर्च सीधे जनता पर डालना पूरी तरह गलत है. इसे निजी कंपनियों के फायदे के लिए उठाया गया कदम बताया जा रहा है, जिस पर आयोग से सख्त रुख अपनाने की मांग की जा रही है.

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11 महीनों में 1400 करोड़ की कथित अतिरिक्त वसूली पर आयोग सख्त

बिजली दरें न बढ़ने के दावे के बीच एक और बड़ा खुलासा सामने आया है. आरोप है कि पिछले 11 महीनों में अलग-अलग शुल्कों और सरचार्ज के नाम पर उपभोक्ताओं से करीब 1400 करोड़ रुपये अतिरिक्त वसूल लिए गए हैं. फरवरी महीने के बिजली बिल में 10 प्रतिशत अतिरिक्त चार्ज लगाए जाने की शिकायतों के बाद यह मामला तूल पकड़ गया.

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राज्य विद्युत नियामक आयोग ने इस पर गंभीरता दिखाते हुए पावर कॉरपोरेशन से पूरी गणना और दस्तावेज तलब किए हैं. आयोग का साफ कहना है कि अगर संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो अब तक हुई पूरी वसूली की गहन जांच कराई जाएगी. इससे यह सवाल और मजबूत हो गया है कि क्या घाटे का आंकड़ा सही है या उपभोक्ताओं से पहले ही अतिरिक्त पैसा लिया जा चुका है.

छह साल से दरें न बढ़ने का दावा, पर्दे के पीछे बढ़ा बोझ

बिजली कंपनियां यह तर्क दे रही हैं कि उत्तर प्रदेश में पिछले छह सालों से बिजली की दरें नहीं बढ़ाई गई हैं, इसलिए अब टैरिफ बढ़ाना जरूरी हो गया है. लेकिन उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि वास्तविकता इससे अलग है. फिक्स चार्ज, फ्यूल सरचार्ज, बिजली शुल्क और अन्य मदों में लगातार बदलाव कर उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ाया गया है.

कई उपभोक्ताओं का आरोप है कि बिल की गणना इतनी जटिल कर दी गई है कि आम आदमी को समझ ही नहीं आता कि वह किस बात का पैसा दे रहा है. इसी वजह से अब बिजली दरों में प्रस्तावित बढ़ोतरी के खिलाफ गुस्सा और अविश्वास दोनों बढ़ते जा रहे हैं.

निजीकरण के खिलाफ 12 फरवरी को प्रदेशव्यापी आंदोलन

बिजली दरों के साथ-साथ निजीकरण का मुद्दा भी फिर से केंद्र में आ गया है. विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण के विरोध में बिजली कर्मचारियों ने 12 फरवरी को प्रदेशव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है. कर्मचारी संगठनों ने अपनी 10 सूत्रीय मांगों को लेकर सड़क पर उतरने की तैयारी कर ली है.

इस आंदोलन को किसान संगठनों और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों का भी समर्थन मिल रहा है. कर्मचारियों का कहना है कि निजीकरण से न तो सेवा सुधरेगी और न ही उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली मिलेगी, बल्कि इसका सीधा फायदा निजी कंपनियों को होगा. उनका साफ संदेश है कि जब तक निजीकरण का फैसला वापस नहीं लिया जाता, संघर्ष जारी रहेगा.

07 Feb 2026 By Vishwa Deepak Awasthi

UPPCL News: यूपी में 20 प्रतिशत तक महंगी हो सकती है बिजली, 1400 करोड़ की वसूली पर उठे सवाल, इस दिन होगा बड़ा आंदोलन

UPPCL News: यूपी में बिजली दरों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. एक तरफ बिजली कंपनियां भारी घाटे का हवाला देकर टैरिफ बढ़ाने की तैयारी में हैं, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ताओं से कथित अतिरिक्त वसूली और निजीकरण के खिलाफ विरोध तेज हो गया है. मार्च में होने वाली सुनवाई से पहले यह मुद्दा पूरी तरह सियासी और सामाजिक बहस का केंद्र बन चुका है.

20 प्रतिशत तक टैरिफ बढ़ाने की तैयारी, मार्च में होगा अंतिम फैसला

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उत्तर प्रदेश की बिजली वितरण कंपनियों ने बिजली दरों में करीब 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी का प्रस्ताव राज्य विद्युत नियामक आयोग के सामने रखा है. कंपनियों का दावा है कि उन्हें 12,453 करोड़ रुपये से अधिक का घाटा उठाना पड़ रहा है, जिसकी भरपाई मौजूदा दरों से संभव नहीं है. आयोग ने प्रस्ताव को प्रारंभिक रूप से स्वीकार करते हुए मार्च महीने में इस पर अंतिम सुनवाई तय की है.

इससे पहले कंपनियों को निर्देश दिया गया है कि वे अपना पूरा प्रस्ताव प्रमुख अखबारों में प्रकाशित करें ताकि आम उपभोक्ता भी इसे पढ़ सकें. आयोग ने उपभोक्ताओं को 21 दिन का समय दिया है, जिसमें वे अपनी आपत्तियां और सुझाव दर्ज करा सकेंगे. यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही यह तय होगा कि बिजली कितनी महंगी होगी और किस श्रेणी के उपभोक्ताओं पर कितना भार पड़ेगा.

स्मार्ट मीटर का खर्च भी उपभोक्ताओं पर डालने की योजना

बिजली कंपनियों के प्रस्ताव का सबसे विवादित हिस्सा स्मार्ट प्रीपेड मीटर को लेकर है. कंपनियों ने कहा है कि स्मार्ट मीटर लगाने, उनके रखरखाव और संचालन पर करीब 3,837 करोड़ रुपये खर्च होंगे. इस पूरी राशि को भी बिजली दरों में शामिल करने की मांग की गई है. इसका मतलब यह है कि उपभोक्ताओं को न सिर्फ यूनिट रेट बढ़ने का सामना करना पड़ेगा, बल्कि तकनीकी बदलाव का खर्च भी उनके बिल में जुड़ जाएगा.

उपभोक्ता परिषद और सामाजिक संगठनों का कहना है कि स्मार्ट मीटर सरकारी नीति का हिस्सा हैं, इसलिए उनका खर्च सीधे जनता पर डालना पूरी तरह गलत है. इसे निजी कंपनियों के फायदे के लिए उठाया गया कदम बताया जा रहा है, जिस पर आयोग से सख्त रुख अपनाने की मांग की जा रही है.

11 महीनों में 1400 करोड़ की कथित अतिरिक्त वसूली पर आयोग सख्त

बिजली दरें न बढ़ने के दावे के बीच एक और बड़ा खुलासा सामने आया है. आरोप है कि पिछले 11 महीनों में अलग-अलग शुल्कों और सरचार्ज के नाम पर उपभोक्ताओं से करीब 1400 करोड़ रुपये अतिरिक्त वसूल लिए गए हैं. फरवरी महीने के बिजली बिल में 10 प्रतिशत अतिरिक्त चार्ज लगाए जाने की शिकायतों के बाद यह मामला तूल पकड़ गया.

राज्य विद्युत नियामक आयोग ने इस पर गंभीरता दिखाते हुए पावर कॉरपोरेशन से पूरी गणना और दस्तावेज तलब किए हैं. आयोग का साफ कहना है कि अगर संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो अब तक हुई पूरी वसूली की गहन जांच कराई जाएगी. इससे यह सवाल और मजबूत हो गया है कि क्या घाटे का आंकड़ा सही है या उपभोक्ताओं से पहले ही अतिरिक्त पैसा लिया जा चुका है.

छह साल से दरें न बढ़ने का दावा, पर्दे के पीछे बढ़ा बोझ

बिजली कंपनियां यह तर्क दे रही हैं कि उत्तर प्रदेश में पिछले छह सालों से बिजली की दरें नहीं बढ़ाई गई हैं, इसलिए अब टैरिफ बढ़ाना जरूरी हो गया है. लेकिन उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि वास्तविकता इससे अलग है. फिक्स चार्ज, फ्यूल सरचार्ज, बिजली शुल्क और अन्य मदों में लगातार बदलाव कर उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ाया गया है.

कई उपभोक्ताओं का आरोप है कि बिल की गणना इतनी जटिल कर दी गई है कि आम आदमी को समझ ही नहीं आता कि वह किस बात का पैसा दे रहा है. इसी वजह से अब बिजली दरों में प्रस्तावित बढ़ोतरी के खिलाफ गुस्सा और अविश्वास दोनों बढ़ते जा रहे हैं.

निजीकरण के खिलाफ 12 फरवरी को प्रदेशव्यापी आंदोलन

बिजली दरों के साथ-साथ निजीकरण का मुद्दा भी फिर से केंद्र में आ गया है. विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण के विरोध में बिजली कर्मचारियों ने 12 फरवरी को प्रदेशव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है. कर्मचारी संगठनों ने अपनी 10 सूत्रीय मांगों को लेकर सड़क पर उतरने की तैयारी कर ली है.

इस आंदोलन को किसान संगठनों और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों का भी समर्थन मिल रहा है. कर्मचारियों का कहना है कि निजीकरण से न तो सेवा सुधरेगी और न ही उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली मिलेगी, बल्कि इसका सीधा फायदा निजी कंपनियों को होगा. उनका साफ संदेश है कि जब तक निजीकरण का फैसला वापस नहीं लिया जाता, संघर्ष जारी रहेगा.

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