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UP Panchayat Chunav 2026: विधानसभा चुनाव के बाद ही होंगे पंचायत चुनाव ! प्रशासक बैठाने की तैयारी, राजभर बोले- कोई नहीं चाहता अभी चुनाव

UP Panchayat Chunav 2026: विधानसभा चुनाव के बाद ही होंगे पंचायत चुनाव ! प्रशासक बैठाने की तैयारी, राजभर बोले- कोई नहीं चाहता अभी चुनाव
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद होंगे पंचायत चुनाव जानिए क्या है राजभर का बयान (फाइल फोटो): Image Credit Original Source

उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव तय समय पर होना मुश्किल नजर आ रहा है. पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने से पहले नई व्यवस्था बन पाना संभव नहीं दिख रहा. सरकार कार्यकाल बढ़ाने या प्रशासक नियुक्त करने पर विचार कर रही है. पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने भी बड़ा बयान दिया है.

UP Panchayat Chunav 2026: उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर स्थिति अब लगभग साफ होती दिख रही है. प्रशासनिक देरी, अधूरी आरक्षण प्रक्रिया और राजनीतिक प्राथमिकताओं के चलते पंचायत चुनाव टलने की पूरी संभावना बन गई है. इस बीच पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर का बयान भी सामने आया है, जिसने इस मुद्दे को और स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल कोई भी दल पंचायत चुनाव नहीं चाहता.

समय सीमा खत्म, लेकिन नई पंचायतों का गठन संभव नहीं

प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई, क्षेत्र पंचायतों का 19 जुलाई और जिला पंचायतों का 11 जुलाई को समाप्त हो रहा है. लेकिन उससे पहले नई पंचायतों का गठन कर पाना लगभग असंभव माना जा रहा है. वजह यह है कि चुनाव प्रक्रिया के जरूरी चरण अभी अधूरे हैं.

मतदाता सूची 15 अप्रैल को प्रकाशित होगी, जिसके बाद आरक्षण तय करना और चुनाव कराना बेहद कम समय में संभव नहीं दिखता. प्रशासनिक स्तर पर भी इस स्थिति को लेकर असमंजस बना हुआ है. यही कारण है कि अब यह लगभग तय माना जा रहा है कि निर्धारित समय पर चुनाव नहीं हो पाएंगे.

विधानसभा चुनाव पर टिका राजनीतिक फोकस

प्रदेश की राजनीति इस समय पूरी तरह 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव पर केंद्रित हो चुकी है. भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा सहित सभी प्रमुख दल अपने संसाधन और रणनीति उसी दिशा में लगा रहे हैं. ऐसे में कोई भी पार्टी पंचायत चुनाव जैसे बड़े स्थानीय चुनाव में उलझना नहीं चाहती.

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यही वजह है कि विपक्ष की ओर से भी चुनाव जल्द कराने की मांग नहीं उठ रही है. राजनीतिक रूप से यह एक ऐसा मौन सहमति का माहौल बन गया है, जहां सभी दल पंचायत चुनाव को टालने के पक्ष में नजर आ रहे हैं. इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि पंचायत चुनाव अब विधानसभा चुनाव के बाद ही कराए जाएंगे.

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ओमप्रकाश राजभर का बड़ा बयान, साफ किया रुख

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने इस मुद्दे पर साफ शब्दों में कहा कि फिलहाल कोई भी दल पंचायत चुनाव नहीं चाहता है. उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसी की भी प्राथमिकता अभी पंचायत चुनाव नहीं है. सपा और कांग्रेस की ओर से भी इस संबंध में कोई मांग नहीं उठाई गई है.

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राजभर ने यह भी बताया कि मामला अब हाईकोर्ट में पहुंच चुका है और आगे का फैसला अदालत के निर्देशों के आधार पर ही होगा. उनका यह बयान इस बात की पुष्टि करता है कि पंचायत चुनाव टलने की संभावना अब लगभग तय है.

कार्यकाल बढ़ाने या प्रशासक नियुक्ति पर विचार

सरकार के सामने अब दो प्रमुख विकल्प हैं. पहला, मौजूदा पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल बढ़ाया जाए. दूसरा, अगर इसमें कोई कानूनी अड़चन आती है तो पंचायतों में प्रशासक नियुक्त किए जाएं. पहले भी ऐसी परिस्थितियों में प्रशासक बैठाए जा चुके हैं, इसलिए यह विकल्प पूरी तरह व्यवहारिक माना जा रहा है.

हालांकि, कार्यकाल बढ़ाने का फैसला कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है. सरकार इस पर सावधानीपूर्वक विचार कर रही है ताकि कोई भी निर्णय बाद में न्यायालय में अटक न जाए. फिलहाल दोनों विकल्पों पर समानांतर मंथन जारी है.

हाईकोर्ट में मामला, आयोग ने दाखिल किया एफिडेविट

पंचायत चुनाव में देरी को लेकर मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है. याचिका में कहा गया है कि मतदाता सूची अप्रैल के मध्य में तैयार होगी, जिससे आरक्षण और चुनाव प्रक्रिया के लिए पर्याप्त समय नहीं बचेगा.

अदालत ने राज्य निर्वाचन आयोग से इस पर एफिडेविट मांगा था. सूत्रों के अनुसार आयोग ने अपना पक्ष कोर्ट में रख दिया है और अपनी तैयारियों की स्थिति स्पष्ट की है. अब सभी की नजर हाईकोर्ट के फैसले पर है, जो तय करेगा कि चुनाव कब और कैसे कराए जाएंगे या फिर वैकल्पिक व्यवस्था लागू होगी.

आरक्षण प्रक्रिया बनी सबसे बड़ी बाधा

त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में आरक्षण प्रक्रिया सबसे जटिल और समय लेने वाली होती है. इसके लिए राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन जरूरी है, जो अभी तक नहीं हुआ है. यह आयोग जिलों में जाकर ओबीसी आबादी का आंकड़ा जुटाता है और उसी आधार पर आरक्षण तय करता है.

नियम के अनुसार किसी भी ब्लॉक में ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता. हालांकि, यदि आबादी कम है तो उसी अनुपात में आरक्षण तय होता है. राज्य स्तर पर कुल आरक्षण 27 प्रतिशत रखना अनिवार्य है. यही पूरी प्रक्रिया चुनाव में देरी की मुख्य वजह बन रही है.

06 Apr 2026 By Vishwa Deepak Awasthi

UP Panchayat Chunav 2026: विधानसभा चुनाव के बाद ही होंगे पंचायत चुनाव ! प्रशासक बैठाने की तैयारी, राजभर बोले- कोई नहीं चाहता अभी चुनाव

UP Panchayat Chunav 2026: उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर स्थिति अब लगभग साफ होती दिख रही है. प्रशासनिक देरी, अधूरी आरक्षण प्रक्रिया और राजनीतिक प्राथमिकताओं के चलते पंचायत चुनाव टलने की पूरी संभावना बन गई है. इस बीच पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर का बयान भी सामने आया है, जिसने इस मुद्दे को और स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल कोई भी दल पंचायत चुनाव नहीं चाहता.

समय सीमा खत्म, लेकिन नई पंचायतों का गठन संभव नहीं

प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई, क्षेत्र पंचायतों का 19 जुलाई और जिला पंचायतों का 11 जुलाई को समाप्त हो रहा है. लेकिन उससे पहले नई पंचायतों का गठन कर पाना लगभग असंभव माना जा रहा है. वजह यह है कि चुनाव प्रक्रिया के जरूरी चरण अभी अधूरे हैं.

मतदाता सूची 15 अप्रैल को प्रकाशित होगी, जिसके बाद आरक्षण तय करना और चुनाव कराना बेहद कम समय में संभव नहीं दिखता. प्रशासनिक स्तर पर भी इस स्थिति को लेकर असमंजस बना हुआ है. यही कारण है कि अब यह लगभग तय माना जा रहा है कि निर्धारित समय पर चुनाव नहीं हो पाएंगे.

विधानसभा चुनाव पर टिका राजनीतिक फोकस

प्रदेश की राजनीति इस समय पूरी तरह 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव पर केंद्रित हो चुकी है. भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा सहित सभी प्रमुख दल अपने संसाधन और रणनीति उसी दिशा में लगा रहे हैं. ऐसे में कोई भी पार्टी पंचायत चुनाव जैसे बड़े स्थानीय चुनाव में उलझना नहीं चाहती.

यही वजह है कि विपक्ष की ओर से भी चुनाव जल्द कराने की मांग नहीं उठ रही है. राजनीतिक रूप से यह एक ऐसा मौन सहमति का माहौल बन गया है, जहां सभी दल पंचायत चुनाव को टालने के पक्ष में नजर आ रहे हैं. इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि पंचायत चुनाव अब विधानसभा चुनाव के बाद ही कराए जाएंगे.

ओमप्रकाश राजभर का बड़ा बयान, साफ किया रुख

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने इस मुद्दे पर साफ शब्दों में कहा कि फिलहाल कोई भी दल पंचायत चुनाव नहीं चाहता है. उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसी की भी प्राथमिकता अभी पंचायत चुनाव नहीं है. सपा और कांग्रेस की ओर से भी इस संबंध में कोई मांग नहीं उठाई गई है.

राजभर ने यह भी बताया कि मामला अब हाईकोर्ट में पहुंच चुका है और आगे का फैसला अदालत के निर्देशों के आधार पर ही होगा. उनका यह बयान इस बात की पुष्टि करता है कि पंचायत चुनाव टलने की संभावना अब लगभग तय है.

कार्यकाल बढ़ाने या प्रशासक नियुक्ति पर विचार

सरकार के सामने अब दो प्रमुख विकल्प हैं. पहला, मौजूदा पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल बढ़ाया जाए. दूसरा, अगर इसमें कोई कानूनी अड़चन आती है तो पंचायतों में प्रशासक नियुक्त किए जाएं. पहले भी ऐसी परिस्थितियों में प्रशासक बैठाए जा चुके हैं, इसलिए यह विकल्प पूरी तरह व्यवहारिक माना जा रहा है.

हालांकि, कार्यकाल बढ़ाने का फैसला कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है. सरकार इस पर सावधानीपूर्वक विचार कर रही है ताकि कोई भी निर्णय बाद में न्यायालय में अटक न जाए. फिलहाल दोनों विकल्पों पर समानांतर मंथन जारी है.

हाईकोर्ट में मामला, आयोग ने दाखिल किया एफिडेविट

पंचायत चुनाव में देरी को लेकर मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है. याचिका में कहा गया है कि मतदाता सूची अप्रैल के मध्य में तैयार होगी, जिससे आरक्षण और चुनाव प्रक्रिया के लिए पर्याप्त समय नहीं बचेगा.

अदालत ने राज्य निर्वाचन आयोग से इस पर एफिडेविट मांगा था. सूत्रों के अनुसार आयोग ने अपना पक्ष कोर्ट में रख दिया है और अपनी तैयारियों की स्थिति स्पष्ट की है. अब सभी की नजर हाईकोर्ट के फैसले पर है, जो तय करेगा कि चुनाव कब और कैसे कराए जाएंगे या फिर वैकल्पिक व्यवस्था लागू होगी.

आरक्षण प्रक्रिया बनी सबसे बड़ी बाधा

त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में आरक्षण प्रक्रिया सबसे जटिल और समय लेने वाली होती है. इसके लिए राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन जरूरी है, जो अभी तक नहीं हुआ है. यह आयोग जिलों में जाकर ओबीसी आबादी का आंकड़ा जुटाता है और उसी आधार पर आरक्षण तय करता है.

नियम के अनुसार किसी भी ब्लॉक में ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता. हालांकि, यदि आबादी कम है तो उसी अनुपात में आरक्षण तय होता है. राज्य स्तर पर कुल आरक्षण 27 प्रतिशत रखना अनिवार्य है. यही पूरी प्रक्रिया चुनाव में देरी की मुख्य वजह बन रही है.

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