फ़तेहपुर:हिन्दू की गीता मुस्लिम की कुरान है ख़ाकी..जिले के छात्र द्वारा पुलिस के त्याग और समर्पण पर लिखी गई कविता।

कोरोना से जंग लड़ रहे पुलिस के जवानों के सम्मान में जिले के छात्र प्रद्युम्न त्रिपाठी ने एक कविता लिखी है..युगान्तर प्रवाह पर पढ़े उनकी यह कविता..

फ़तेहपुर:हिन्दू की गीता मुस्लिम की कुरान है ख़ाकी..जिले के छात्र द्वारा पुलिस के त्याग और समर्पण पर लिखी गई कविता।
सांकेतिक फ़ोटो-गूगल

फ़तेहपुरकोरोना के विरुद्ध जारी इस जंग में पुलिस के जवान अपने घर परिवारों से दूर सड़को पर मुस्तैदी के साथ जनता की सेवा में जुटे हुए हैं।कोरोना वॉरियर्स के रूप में लड़ रहे इन जवानों के लिए शहर के अशोक नगर मोहल्ले के रहने वाले छात्र प्रद्युम्न त्रिपाठी ने एक कविता लिखी है।कविता का शीर्षक है- 

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'जान है ये ख़ाकी'

हम एक जिस्म हैं तो जान है ये खाकी।

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हम हर सुबह हैं तो हर शाम है ये खाकी।।

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हमारे हर संकट में हनुमान है ये खाकी।

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हमारे गम में छिपी मुस्कान है ये खाकी।।up police news

न हिन्दू है न मुसलमान है ये ख़ाकी।

अब्दुल अटल रसखान है ये खाकी।।

हमारी नवरात्रि तुम्हारी रमजान है ये खाकी।

शैतान नहीं ईश्वर का प्यारा इंसान है ये खाकी।। 

हिन्दू की गीता मुस्लिम की कुरान है ये खाकी।

नफरत नहीं मुहब्बत की पहचान है ये खाकी।।

बेटे की गलती में पिता की मीठी फटकार है ये खाकी।

इस प्यासी धरती में बारिस की बौछार है ये खाकी।। 

जो कभी गिराई न जा सके वो सरकार है ये खाकी।

जो टूटे न कभी सुरक्षा की अटूट दीवार है ये खाकी।।

अपनो से दूर फिर भी खुशी का त्योहार है ये खाकी।

हम सब की भारत माँ का सुन्दर श्रृंगार है ये खाकी।।

पत्थर खाकर हाँथ कटाकर फर्ज निभाती है ये खाकी।

बन्दूक का सामना लाठी से करके दिखाती है ये खाकी।।

हमें शाहस शील परिश्रम का पाठ सिखाती है ये खाकी।

क्यूँ राजनीति के भवसागर में फंसाई जाती है खाकी।। 

समय समय पर अपना असली रंग दिखाती है ये खाकी।

छिपा कहीं भी हो कोई फिर भी ढूँढ लाती है ये खाकी।। 

यह मत भूलो हम सबपर खाकी के उपकार बहुत हैं। 

सरहद हो या गली मुहल्ला खाकी के अवतार बहुत हैं।।

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