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महिला दिवस पर जानिए बेटियों का कानूनी अधिकार: पिता की संपत्ति में कितना होता है बेटी का हिस्सा, क्या कहता है कानून

महिला दिवस पर जानिए बेटियों का कानूनी अधिकार: पिता की संपत्ति में कितना होता है बेटी का हिस्सा, क्या कहता है कानून
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जाने पिता की संपत्ति पर बेटियों का कितना हक (प्रतीकात्मक फोटो): Image Credit Original Source

महिला दिवस के मौके पर बेटियों के संपत्ति अधिकार को लेकर जागरूकता जरूरी है. भारतीय कानून के अनुसार अब बेटियों को भी पिता की पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार प्राप्त हैं. शादीशुदा बेटियां भी इस हक से वंचित नहीं होतीं और जरूरत पड़ने पर कानूनी दावा कर सकती हैं.

Women Day 2026: हर साल 8 मार्च को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं के अधिकार, समानता और सम्मान की बात करता है. समाज में महिलाएं आज हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, लेकिन कई बार उन्हें अपने कानूनी अधिकारों की पूरी जानकारी नहीं होती. खासतौर पर पिता की संपत्ति में बेटियों के अधिकार को लेकर लोगों में कई भ्रम बने रहते हैं. ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी है कि भारतीय कानून के अनुसार बेटी को अपने पिता की संपत्ति में कितना हक मिलता है.

हिंदू उत्तराधिकार कानून में बेटियों को मिला बराबरी का अधिकार

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत में संपत्ति से जुड़े अधिकार मुख्य रूप से हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत तय किए जाते हैं. लंबे समय तक इस कानून में बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार नहीं मिलते थे. परिवार की पैतृक संपत्ति में बेटों को प्रमुख उत्तराधिकारी माना जाता था, जबकि बेटियों की हिस्सेदारी सीमित थी.

हालांकि समय के साथ महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने के लिए कानून में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए. वर्ष 2005 में हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम लागू किया गया. इस संशोधन के बाद बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार दे दिया गया. अब बेटी को भी जन्म से ही परिवार की संपत्ति में उतना ही अधिकार प्राप्त होता है जितना बेटे को होता है. इस बदलाव को महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और समानता की दिशा में बड़ा कदम माना गया.

पैतृक संपत्ति में जन्म से ही हिस्सेदार होती है बेटी

संशोधित कानून के अनुसार बेटी को पैतृक संपत्ति में जन्म से ही हिस्सेदार माना जाता है. इसका मतलब यह है कि जिस तरह बेटा अपने पिता की पारिवारिक संपत्ति में अधिकार रखता है, उसी तरह बेटी को भी समान अधिकार प्राप्त है.

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पैतृक संपत्ति वह होती है जो परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हो. इस संपत्ति में पिता, बेटा और बेटी सभी का समान अधिकार होता है. यदि संपत्ति का बंटवारा होता है तो बेटी को भी उतना ही हिस्सा मिलेगा जितना बेटे को दिया जाता है.

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कानून यह भी स्पष्ट करता है कि बेटी न केवल हिस्सेदार होती है बल्कि वह परिवार की सह-अधिकारिणी यानी कॉपार्सनर भी मानी जाती है. इसका अर्थ यह है कि उसे संपत्ति में हिस्सा मिलने के साथ-साथ उससे जुड़े फैसलों में भी अधिकार प्राप्त होता है.

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अगर पिता की मृत्यु बिना वसीयत के हो जाए तो क्या होगा?

कई मामलों में पिता अपनी संपत्ति के लिए वसीयत नहीं बनाते. ऐसी स्थिति में संपत्ति का बंटवारा कानून के अनुसार किया जाता है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत यदि पिता की मृत्यु बिना वसीयत के हो जाती है तो उनकी संपत्ति सभी कानूनी वारिसों के बीच बराबर बांटी जाती है.

इन कानूनी वारिसों में पत्नी, बेटा और बेटी शामिल होते हैं. इसका मतलब यह है कि बेटी को भी उतना ही हिस्सा मिलता है जितना बेटे को दिया जाता है. चाहे बेटी शादीशुदा हो या अविवाहित, इस अधिकार पर उसका पूरा हक बना रहता है.

इस तरह के मामलों में अदालत या राजस्व विभाग के माध्यम से संपत्ति का वैधानिक बंटवारा कराया जा सकता है और बेटी कानूनी रूप से अपना हिस्सा प्राप्त कर सकती है.

स्वअर्जित संपत्ति में पिता की भूमिका क्या होती है?

पैतृक संपत्ति और स्वअर्जित संपत्ति के नियम अलग-अलग होते हैं. स्वअर्जित संपत्ति वह होती है जिसे पिता ने अपनी मेहनत और आय से खुद अर्जित किया हो. ऐसी संपत्ति के मामले में पिता को यह अधिकार होता है कि वह अपनी संपत्ति किसे देना चाहते हैं.

अगर पिता अपनी स्वअर्जित संपत्ति के लिए वसीयत बनाते हैं तो उस संपत्ति का बंटवारा वसीयत के अनुसार ही होता है. पिता चाहे तो पूरी संपत्ति किसी एक व्यक्ति को दे सकते हैं या सभी वारिसों में बांट सकते हैं.

हालांकि यदि वसीयत नहीं बनाई गई है तो स्वअर्जित संपत्ति भी कानूनी वारिसों के बीच बराबर बांटी जाती है, जिसमें बेटियां भी बराबर की हिस्सेदार होती हैं.

शादी के बाद भी खत्म नहीं होता बेटी का अधिकार

समाज में लंबे समय तक यह धारणा रही कि शादी के बाद बेटी का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार खत्म हो जाता है. लेकिन कानून इस धारणा को पूरी तरह खारिज करता है.

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार शादीशुदा बेटी भी अपने पिता की पैतृक संपत्ति में उतनी ही अधिकार रखती है जितना अविवाहित बेटी या बेटा. विवाह के बाद भी उसका यह अधिकार समाप्त नहीं होता.

अगर किसी कारणवश बेटी को उसका हिस्सा नहीं दिया जाता, तो वह अदालत में जाकर कानूनी दावा कर सकती है. अदालत के माध्यम से वह अपने अधिकार को प्राप्त कर सकती है. यही कारण है कि महिला दिवस जैसे अवसर महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करने का महत्वपूर्ण अवसर बन जाते हैं.

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