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Bihar Politics: बिहार की राजनीति से समाप्त हुआ नीतीश युग! 20 साल बाद सत्ता से विदा हुए कुमार, जानिए पूरा राजनीतिक सफर

Bihar Politics: बिहार की राजनीति से समाप्त हुआ नीतीश युग! 20 साल बाद सत्ता से विदा हुए कुमार, जानिए पूरा राजनीतिक सफर
बिहार की सत्ता से नीतीश की बिदाई, राज्यपाल को सौंपा त्यागपत्र: Image Credit Original Source

करीब दो दशकों तक बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश कुमार ने आखिरकार मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. उनके इस फैसले के साथ ही एक लंबे राजनीतिक युग का अंत माना जा रहा है. गठबंधन बदलने और सत्ता संतुलन साधने की उनकी राजनीति अब इतिहास बनती दिख रही है.

Nitish Kumar Political Journey: बिहार की राजनीति में ‘सुशासन’ की पहचान बने नीतीश कुमार ने 20 साल लंबे सत्ता काल के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर एक युग के अंत का संकेत दे दिया है. 2005 में जब उन्होंने सत्ता संभाली थी, तब बिहार की छवि अपराध और अव्यवस्था से जुड़ी थी. लेकिन अपने फैसलों, गठबंधन रणनीतियों और राजनीतिक संतुलन से उन्होंने राज्य की राजनीति को नई दिशा दी थी. लेकिन उनके सत्ता से जाने की पठकथा चुनाव से पहले ही लिखी जा चुकी थी.

1977 से शुरुआत, हार से सीखकर बने मजबूत नेता

नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर 1977 में शुरू हुआ, जब उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन वो हार गए. हालांकि यह हार उनके लिए अंत नहीं बल्कि सीख साबित हुई. 1985 में उन्होंने जीत दर्ज कर विधानसभा में जगह बनाई और धीरे-धीरे अपनी पहचान मजबूत की.

1987 में लोक दल के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उनकी राजनीतिक पकड़ और मजबूत हुई. 1989 में वे पहली बार लोकसभा पहुंचे और केंद्र की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई. यह वह समय था जब बिहार की राजनीति में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही थी और नीतीश खुद को एक विकल्प के रूप में स्थापित कर रहे थे.

समता पार्टी और केंद्र की राजनीति, ऐसे बनी मजबूत पकड़

1990 के दशक में उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी की स्थापना की. शुरुआती चुनावों में बहुत सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. 1996 में सांसद बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उन्होंने रेल, कृषि और परिवहन जैसे अहम मंत्रालय संभाले.

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रेल मंत्री के रूप में तत्काल टिकट व्यवस्था की शुरुआत उनकी बड़ी उपलब्धियों में शामिल रही. 1999 में गैसल ट्रेन हादसे के बाद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देना उनकी साफ-सुथरी छवि को और मजबूत करता है. इस दौर ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक जिम्मेदार नेता के रूप में स्थापित किया.

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2005 का दौर जब बिहार में दिखा ‘सुशासन’ मॉडल

2005 में भाजपा के साथ मिलकर नीतीश कुमार ने बिहार की सत्ता संभाली और यहीं से उनके राजनीतिक स्वर्णकाल की शुरुआत हुई. उस समय बिहार अपराध, भ्रष्टाचार और पिछड़ेपन के लिए जाना जाता था. नीतीश ने कानून व्यवस्था सुधारने, सड़कों के निर्माण, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण पर विशेष ध्यान दिया. पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देने जैसे फैसलों ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाया. 2010 में भारी बहुमत से मिली जीत ने यह साबित कर दिया कि बिहार की जनता उनके नेतृत्व पर भरोसा करती है.

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गठबंधन बदलने की राजनीति, सत्ता में बने रहने की रणनीति

नीतीश कुमार का राजनीतिक करियर गठबंधन बदलने की रणनीति के लिए भी जाना जाता है. 2014 में लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा दिया और जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया.

2015 में महागठबंधन के साथ चुनाव जीतने के बाद उन्होंने फिर सत्ता संभाली, लेकिन 2017 में तेजस्वी यादव पर लगे आरोपों के बाद उन्होंने गठबंधन तोड़कर भाजपा के साथ सरकार बना ली. इसके बाद 2022 में फिर महागठबंधन में वापसी और 2024 में फिर एनडीए में शामिल होना उनके राजनीतिक लचीलेपन को दर्शाता है. यही रणनीति उन्हें लंबे समय तक सत्ता में बनाए रखने में सफल रही.

2020 से 2026 के बीच नीतीश की घटती पकड़, सत्ता से विदाई

2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू की सीटें कम हो गईं, लेकिन नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने रहे. हालांकि जनता के बीच उनकी पकड़ कमजोर हो रही थी. 2025 में दसवीं बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी राजनीतिक समीकरण बदलते रहे.

अंततः 14 अप्रैल 2026 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. उनका राज्यसभा जाना इस फैसले की बड़ी वजह माना जा रहा है. बिहार चुनाव से पहले ही ये तय हो चुका था कि नीतीश अब प्रदेश की राजनीति से बाहर हो जाएंगे और हुआ भी कुछ ऐसा.

सादगी, संघर्ष और सीमित पारिवारिक दायरा ही नीतीश की कहानी

1 मार्च 1951 को बख्तियारपुर में जन्मे नीतीश कुमार का जीवन बेहद सादा रहा है. उनके पिता आयुर्वेदिक डॉक्टर थे और उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. नौकरी छोड़कर वे जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़े और राजनीति में आए.

उनकी पत्नी मंजू कुमारी का 2007 में निधन हो गया था. उनके बेटे निशांत कुमार अब राजनीति में कदम रख चुके हैं. परिवार हमेशा सार्वजनिक जीवन से दूर रहा, जिसने उनकी छवि को एक सादगीपूर्ण और गंभीर नेता के रूप में बनाए रखा. यही सादगी और रणनीति उनके लंबे राजनीतिक जीवन की पहचान बनी.

14 Apr 2026 By Vishwa Deepak Awasthi

Bihar Politics: बिहार की राजनीति से समाप्त हुआ नीतीश युग! 20 साल बाद सत्ता से विदा हुए कुमार, जानिए पूरा राजनीतिक सफर

Nitish Kumar Political Journey: बिहार की राजनीति में ‘सुशासन’ की पहचान बने नीतीश कुमार ने 20 साल लंबे सत्ता काल के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर एक युग के अंत का संकेत दे दिया है. 2005 में जब उन्होंने सत्ता संभाली थी, तब बिहार की छवि अपराध और अव्यवस्था से जुड़ी थी. लेकिन अपने फैसलों, गठबंधन रणनीतियों और राजनीतिक संतुलन से उन्होंने राज्य की राजनीति को नई दिशा दी थी. लेकिन उनके सत्ता से जाने की पठकथा चुनाव से पहले ही लिखी जा चुकी थी.

1977 से शुरुआत, हार से सीखकर बने मजबूत नेता

नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर 1977 में शुरू हुआ, जब उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन वो हार गए. हालांकि यह हार उनके लिए अंत नहीं बल्कि सीख साबित हुई. 1985 में उन्होंने जीत दर्ज कर विधानसभा में जगह बनाई और धीरे-धीरे अपनी पहचान मजबूत की.

1987 में लोक दल के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उनकी राजनीतिक पकड़ और मजबूत हुई. 1989 में वे पहली बार लोकसभा पहुंचे और केंद्र की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई. यह वह समय था जब बिहार की राजनीति में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही थी और नीतीश खुद को एक विकल्प के रूप में स्थापित कर रहे थे.

समता पार्टी और केंद्र की राजनीति, ऐसे बनी मजबूत पकड़

1990 के दशक में उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी की स्थापना की. शुरुआती चुनावों में बहुत सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. 1996 में सांसद बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उन्होंने रेल, कृषि और परिवहन जैसे अहम मंत्रालय संभाले.

रेल मंत्री के रूप में तत्काल टिकट व्यवस्था की शुरुआत उनकी बड़ी उपलब्धियों में शामिल रही. 1999 में गैसल ट्रेन हादसे के बाद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देना उनकी साफ-सुथरी छवि को और मजबूत करता है. इस दौर ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक जिम्मेदार नेता के रूप में स्थापित किया.

2005 का दौर जब बिहार में दिखा ‘सुशासन’ मॉडल

2005 में भाजपा के साथ मिलकर नीतीश कुमार ने बिहार की सत्ता संभाली और यहीं से उनके राजनीतिक स्वर्णकाल की शुरुआत हुई. उस समय बिहार अपराध, भ्रष्टाचार और पिछड़ेपन के लिए जाना जाता था. नीतीश ने कानून व्यवस्था सुधारने, सड़कों के निर्माण, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण पर विशेष ध्यान दिया. पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देने जैसे फैसलों ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाया. 2010 में भारी बहुमत से मिली जीत ने यह साबित कर दिया कि बिहार की जनता उनके नेतृत्व पर भरोसा करती है.

गठबंधन बदलने की राजनीति, सत्ता में बने रहने की रणनीति

नीतीश कुमार का राजनीतिक करियर गठबंधन बदलने की रणनीति के लिए भी जाना जाता है. 2014 में लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा दिया और जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया.

2015 में महागठबंधन के साथ चुनाव जीतने के बाद उन्होंने फिर सत्ता संभाली, लेकिन 2017 में तेजस्वी यादव पर लगे आरोपों के बाद उन्होंने गठबंधन तोड़कर भाजपा के साथ सरकार बना ली. इसके बाद 2022 में फिर महागठबंधन में वापसी और 2024 में फिर एनडीए में शामिल होना उनके राजनीतिक लचीलेपन को दर्शाता है. यही रणनीति उन्हें लंबे समय तक सत्ता में बनाए रखने में सफल रही.

2020 से 2026 के बीच नीतीश की घटती पकड़, सत्ता से विदाई

2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू की सीटें कम हो गईं, लेकिन नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने रहे. हालांकि जनता के बीच उनकी पकड़ कमजोर हो रही थी. 2025 में दसवीं बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी राजनीतिक समीकरण बदलते रहे.

अंततः 14 अप्रैल 2026 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. उनका राज्यसभा जाना इस फैसले की बड़ी वजह माना जा रहा है. बिहार चुनाव से पहले ही ये तय हो चुका था कि नीतीश अब प्रदेश की राजनीति से बाहर हो जाएंगे और हुआ भी कुछ ऐसा.

सादगी, संघर्ष और सीमित पारिवारिक दायरा ही नीतीश की कहानी

1 मार्च 1951 को बख्तियारपुर में जन्मे नीतीश कुमार का जीवन बेहद सादा रहा है. उनके पिता आयुर्वेदिक डॉक्टर थे और उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. नौकरी छोड़कर वे जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़े और राजनीति में आए.

उनकी पत्नी मंजू कुमारी का 2007 में निधन हो गया था. उनके बेटे निशांत कुमार अब राजनीति में कदम रख चुके हैं. परिवार हमेशा सार्वजनिक जीवन से दूर रहा, जिसने उनकी छवि को एक सादगीपूर्ण और गंभीर नेता के रूप में बनाए रखा. यही सादगी और रणनीति उनके लंबे राजनीतिक जीवन की पहचान बनी.

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