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Makar Sankranti Kab Hai: अब 54 साल तक 15 जनवरी को ही क्यों मनाई जाएगी मकर संक्रांति, जानिए पूरा ज्योतिषीय कारण

Makar Sankranti Kab Hai: अब 54 साल तक 15 जनवरी को ही क्यों मनाई जाएगी मकर संक्रांति, जानिए पूरा ज्योतिषीय कारण
अब 14 नहीं 15 को होगी मकर संक्रांति, 54 वर्षों के लिए बदल गई तारीख (प्रतीकात्मक फोटो): Image Credit Original Source

मकर संक्रांति की तारीख को लेकर बड़ा ज्योतिषीय तथ्य सामने आया है. सूर्य की गति में हर वर्ष हो रहे सूक्ष्म बदलाव के कारण अब वर्ष 2080 तक मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी. इसके पीछे खगोलीय गणना और 72 वर्षों का चक्र अहम भूमिका निभाता है.

Makar Sankranti Kab Hai: मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं बल्कि सूर्य की ब्रह्मांडीय यात्रा का प्रतीक है. हर वर्ष सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है और इसी क्षण से मकर संक्रांति का पुण्यकाल आरंभ होता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि अब अगले 54 वर्षों तक यह पर्व 15 जनवरी को ही क्यों मनाया जाएगा. इसके पीछे गहरा ज्योतिषीय और ऐतिहासिक विज्ञान छिपा है.

सूर्य का राशि परिवर्तन और मकर संक्रांति का सही समय

ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस वर्ष सूर्य 14 जनवरी की रात 9 बजकर 39 मिनट पर धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेगा. संक्रांति का पुण्यकाल लगभग 16 घंटे तक माना जाता है. चूंकि सूर्य का प्रवेश रात्रिकाल में हो रहा है, इसलिए धार्मिक मान्यता के अनुसार इसका पुण्यकाल अगले दिन सूर्योदय से मान्य होगा.

इसी वजह से मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी को दोपहर तक मनाया जाएगा. शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि जब संक्रांति रात्रि में हो, तो उसका धार्मिक फल अगले दिन प्राप्त होता है. यही कारण है कि पंचांग और धर्माचार्य 15 जनवरी को ही स्नान दान और सूर्य पूजन की सलाह देते हैं.

54 वर्षों तक 15 जनवरी को ही क्यों रहेगी मकर संक्रांति

पंडित गोविंद शास्त्री के अनुसार सूर्य के राशि परिवर्तन में हर वर्ष लगभग 20 मिनट की देरी हो रही है. यही सूक्ष्म विलंब समय के साथ बड़ा अंतर पैदा करता है. तीन वर्षों में यह अंतर लगभग एक घंटे का हो जाता है और 72 वर्षों में यह पूरे 24 घंटे यानी एक दिन का अंतर बना देता है.

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वर्तमान खगोलीय स्थिति के अनुसार वर्ष 2008 में 72 वर्षों का एक चक्र पूर्ण हो चुका है. इसके बावजूद सूर्य का राशि परिवर्तन अभी भी प्रातःकाल या रात्रिकाल के आसपास हो रहा है. इसी कारण वर्ष 2026 से लेकर 2080 तक मकर संक्रांति मुख्य रूप से 15 जनवरी को ही मनाई जाती रहेगी.

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सूर्य की प्रत्यक्ष गति और संक्रांति का खगोलीय विज्ञान

सूर्य और चंद्रमा जैसे ग्रह कभी वक्री नहीं होते. उनकी गति सदैव प्रत्यक्ष होती है. यही कारण है कि इनके राशि परिवर्तन का समय पीछे नहीं जाता बल्कि धीरे धीरे आगे बढ़ता रहता है. इसी खगोलीय नियम के कारण मकर संक्रांति की तिथि भी स्थिर नहीं रहती.

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हर 72 वर्षों में यह पर्व एक दिन आगे खिसक जाता है. यह कोई धार्मिक भ्रम नहीं बल्कि खगोल विज्ञान का प्रमाणित तथ्य है. यही कारण है कि आने वाले वर्षों में मकर संक्रांति 16 जनवरी को भी मनाई जाएगी, लेकिन वह समय अभी 2080 के बाद आएगा.

मकर संक्रांति की तारीख का ऐतिहासिक बदलाव

इतिहास पर नजर डालें तो मकर संक्रांति की तारीख समय समय पर बदलती रही है. वर्ष 1792 से 1863 तक यह पर्व 12 जनवरी को मनाया जाता था. 1864 से 1936 तक यह 13 जनवरी को पड़ा. इसके बाद 1936 से लेकर हाल के वर्षों तक मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती रही.

पिछले कुछ वर्षों में सूर्य का राशि परिवर्तन सुबह के समय होने के कारण धर्मशास्त्रों के अनुसार इसे पूर्वकाल मानकर 15 जनवरी को संक्रांति मनाई जाने लगी. इस प्रकार यह बदलाव किसी एक वर्ष का नहीं बल्कि सदियों से चली आ रही खगोलीय प्रक्रिया का परिणाम है.

मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व और पुण्यकाल

मकर संक्रांति के दिन का धार्मिक महत्व अत्यंत विशेष माना गया है. शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन साधारण नदी भी गंगा के समान पवित्र हो जाती है. पवित्र नदियों में स्नान, सूर्य को अर्घ्य, तिल और गुड़ का दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है.

वर्ष 1863 में जब स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था, उस दिन भी मकर संक्रांति का पावन संयोग था. यह पर्व सूर्य के उत्तरायण होने का प्रतीक है, जिसे देवताओं का दिन माना जाता है. इसलिए सनातन धर्म में इस दिन दान पुण्य का विशेष महात्म्य बताया गया है.

14 Jan 2026 By Vishwa Deepak Awasthi

Makar Sankranti Kab Hai: अब 54 साल तक 15 जनवरी को ही क्यों मनाई जाएगी मकर संक्रांति, जानिए पूरा ज्योतिषीय कारण

Makar Sankranti Kab Hai: मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं बल्कि सूर्य की ब्रह्मांडीय यात्रा का प्रतीक है. हर वर्ष सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है और इसी क्षण से मकर संक्रांति का पुण्यकाल आरंभ होता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि अब अगले 54 वर्षों तक यह पर्व 15 जनवरी को ही क्यों मनाया जाएगा. इसके पीछे गहरा ज्योतिषीय और ऐतिहासिक विज्ञान छिपा है.

सूर्य का राशि परिवर्तन और मकर संक्रांति का सही समय

ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस वर्ष सूर्य 14 जनवरी की रात 9 बजकर 39 मिनट पर धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेगा. संक्रांति का पुण्यकाल लगभग 16 घंटे तक माना जाता है. चूंकि सूर्य का प्रवेश रात्रिकाल में हो रहा है, इसलिए धार्मिक मान्यता के अनुसार इसका पुण्यकाल अगले दिन सूर्योदय से मान्य होगा.

इसी वजह से मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी को दोपहर तक मनाया जाएगा. शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि जब संक्रांति रात्रि में हो, तो उसका धार्मिक फल अगले दिन प्राप्त होता है. यही कारण है कि पंचांग और धर्माचार्य 15 जनवरी को ही स्नान दान और सूर्य पूजन की सलाह देते हैं.

54 वर्षों तक 15 जनवरी को ही क्यों रहेगी मकर संक्रांति

पंडित गोविंद शास्त्री के अनुसार सूर्य के राशि परिवर्तन में हर वर्ष लगभग 20 मिनट की देरी हो रही है. यही सूक्ष्म विलंब समय के साथ बड़ा अंतर पैदा करता है. तीन वर्षों में यह अंतर लगभग एक घंटे का हो जाता है और 72 वर्षों में यह पूरे 24 घंटे यानी एक दिन का अंतर बना देता है.

वर्तमान खगोलीय स्थिति के अनुसार वर्ष 2008 में 72 वर्षों का एक चक्र पूर्ण हो चुका है. इसके बावजूद सूर्य का राशि परिवर्तन अभी भी प्रातःकाल या रात्रिकाल के आसपास हो रहा है. इसी कारण वर्ष 2026 से लेकर 2080 तक मकर संक्रांति मुख्य रूप से 15 जनवरी को ही मनाई जाती रहेगी.

सूर्य की प्रत्यक्ष गति और संक्रांति का खगोलीय विज्ञान

सूर्य और चंद्रमा जैसे ग्रह कभी वक्री नहीं होते. उनकी गति सदैव प्रत्यक्ष होती है. यही कारण है कि इनके राशि परिवर्तन का समय पीछे नहीं जाता बल्कि धीरे धीरे आगे बढ़ता रहता है. इसी खगोलीय नियम के कारण मकर संक्रांति की तिथि भी स्थिर नहीं रहती.

हर 72 वर्षों में यह पर्व एक दिन आगे खिसक जाता है. यह कोई धार्मिक भ्रम नहीं बल्कि खगोल विज्ञान का प्रमाणित तथ्य है. यही कारण है कि आने वाले वर्षों में मकर संक्रांति 16 जनवरी को भी मनाई जाएगी, लेकिन वह समय अभी 2080 के बाद आएगा.

मकर संक्रांति की तारीख का ऐतिहासिक बदलाव

इतिहास पर नजर डालें तो मकर संक्रांति की तारीख समय समय पर बदलती रही है. वर्ष 1792 से 1863 तक यह पर्व 12 जनवरी को मनाया जाता था. 1864 से 1936 तक यह 13 जनवरी को पड़ा. इसके बाद 1936 से लेकर हाल के वर्षों तक मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती रही.

पिछले कुछ वर्षों में सूर्य का राशि परिवर्तन सुबह के समय होने के कारण धर्मशास्त्रों के अनुसार इसे पूर्वकाल मानकर 15 जनवरी को संक्रांति मनाई जाने लगी. इस प्रकार यह बदलाव किसी एक वर्ष का नहीं बल्कि सदियों से चली आ रही खगोलीय प्रक्रिया का परिणाम है.

मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व और पुण्यकाल

मकर संक्रांति के दिन का धार्मिक महत्व अत्यंत विशेष माना गया है. शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन साधारण नदी भी गंगा के समान पवित्र हो जाती है. पवित्र नदियों में स्नान, सूर्य को अर्घ्य, तिल और गुड़ का दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है.

वर्ष 1863 में जब स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था, उस दिन भी मकर संक्रांति का पावन संयोग था. यह पर्व सूर्य के उत्तरायण होने का प्रतीक है, जिसे देवताओं का दिन माना जाता है. इसलिए सनातन धर्म में इस दिन दान पुण्य का विशेष महात्म्य बताया गया है.

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