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जयंती:पुलिस वाले से लाठी छीन जब दंगाइयो को नेहरू ने खुद दौड़ाया..!

जयंती:पुलिस वाले से लाठी छीन जब दंगाइयो को नेहरू ने खुद दौड़ाया..!
फाइल फोटो-जवाहर लाल नेहरु

बुधवार को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की जयंती है, इस मौके पर युगान्तर प्रवाह लाया है अपने पाठकों के लिए नेहरू के जीवन से जुड़े कुछ किस्से...


दिल्ली: बात सन् 1947 की है हमें वर्षों की गुलामी के बाद आजादी तो मिली,पर उसके साथ मिला 1947 का वो विभाजनकारी काला अध्याय,चारो तरफ़ हत्या,लूट,चीख़ पुकार मची हुई थी,इसी बीच नेहरू को सूचना मिली कि दिल्ली के कनॉट प्लेस इलाके में कुछ मुसलमानो की दुकानें लूटी जा रहीं हैं,जब नेहरू वहाँ पहुंचे तो उन्होंने देखा कि पुलिस तो खड़ी तमाशा देख रही है और हिंदू और सिख दंगाई मुसलमानों की दुकान से औरतों के हैंडबैग, कॉस्मेटिक्स और मफ़लर ले कर भाग रहे हैं. नेहरू को इतना गुस्सा या कि उन्होंने पास खड़े एक सुस्त पुलिस वाले के हाथों से लाठी छीन कर दंगाइयों को दौड़ा लिया. बात यहीं ख़त्म नहीं हुई.

पूर्व आईसीएस अधिकारी और कई देशों में भारत के राजदूत रहे बदरुद्दीन तैयबजी अपनी आत्मकथा 'मेमॉएर्स ऑफ़ एन इगोइस्ट' में लिखते हैं, "एक रात मैंने नेहरू के घर पहुंच कर उन्हें बताया कि पुरानी दिल्ली से शरणार्थी शिविर पहुंचने की कोशिश कर रहे मुसलमानों को मिंटो ब्रिज के आस-पास घेर कर मारा जा रहा है."

बदरुद्दीन तैयबजी ने लिखा है, "ये सुनते ही नेहरू तमक कर उठे और तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर चले गए. थोड़ी देर बाद जब वो उतरे तो उनके हाथ में एक पुरानी, धूल से भरी एक रिवॉल्वर थी. दरअसल ये रिवॉल्वर उनके पिता मोतीलाल की थी, जिससे सालों से कोई गोली नहीं चलाई गई थी."

तैयबजी लिखते हैं, "उन्होंने मुझसे कहा कि हम लोग गंदे और पुराने कुर्ते पहन कर रात को मिंटो ब्रिज चलेंगे. हम ये दिखाएंगे कि हम भी भाग रहे मुसलमान हैं. अगर कोई हम पर हमला करने की कोशिश करेगा तो हम उसे गोली से उड़ा देंगे. मैं नेहरू की ये बात सुन कर हक्काबक्का रह गया. दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश के प्रधानमंत्री को ये समझाने में मुझे एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा कि इस तरह के अपराध से निपटने के और भी बेहतर तरीके हैं."

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माउंटबेटन को हमेशा इस बात का डर लगा रहता था कि नेहरू का इस तरह का आवेश एक दिन उनकी मौत का कारण बन सकता है. इसलिए उन्होंने इनकी निगरानी के लिए कुछ सैनिक लगा रखे थे.

Read More: Sonam Wangchuk Hunger Strike: संसद मार्च से पहले सोनम वांगचुक का बड़ा ऐलान, अनशन खत्म करने के लिए रखीं तीन शर्तें

13 Nov 2018 By Vishwa Deepak Awasthi

जयंती:पुलिस वाले से लाठी छीन जब दंगाइयो को नेहरू ने खुद दौड़ाया..!


दिल्ली: बात सन् 1947 की है हमें वर्षों की गुलामी के बाद आजादी तो मिली,पर उसके साथ मिला 1947 का वो विभाजनकारी काला अध्याय,चारो तरफ़ हत्या,लूट,चीख़ पुकार मची हुई थी,इसी बीच नेहरू को सूचना मिली कि दिल्ली के कनॉट प्लेस इलाके में कुछ मुसलमानो की दुकानें लूटी जा रहीं हैं,जब नेहरू वहाँ पहुंचे तो उन्होंने देखा कि पुलिस तो खड़ी तमाशा देख रही है और हिंदू और सिख दंगाई मुसलमानों की दुकान से औरतों के हैंडबैग, कॉस्मेटिक्स और मफ़लर ले कर भाग रहे हैं. नेहरू को इतना गुस्सा या कि उन्होंने पास खड़े एक सुस्त पुलिस वाले के हाथों से लाठी छीन कर दंगाइयों को दौड़ा लिया. बात यहीं ख़त्म नहीं हुई.

पूर्व आईसीएस अधिकारी और कई देशों में भारत के राजदूत रहे बदरुद्दीन तैयबजी अपनी आत्मकथा 'मेमॉएर्स ऑफ़ एन इगोइस्ट' में लिखते हैं, "एक रात मैंने नेहरू के घर पहुंच कर उन्हें बताया कि पुरानी दिल्ली से शरणार्थी शिविर पहुंचने की कोशिश कर रहे मुसलमानों को मिंटो ब्रिज के आस-पास घेर कर मारा जा रहा है."

बदरुद्दीन तैयबजी ने लिखा है, "ये सुनते ही नेहरू तमक कर उठे और तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर चले गए. थोड़ी देर बाद जब वो उतरे तो उनके हाथ में एक पुरानी, धूल से भरी एक रिवॉल्वर थी. दरअसल ये रिवॉल्वर उनके पिता मोतीलाल की थी, जिससे सालों से कोई गोली नहीं चलाई गई थी."

तैयबजी लिखते हैं, "उन्होंने मुझसे कहा कि हम लोग गंदे और पुराने कुर्ते पहन कर रात को मिंटो ब्रिज चलेंगे. हम ये दिखाएंगे कि हम भी भाग रहे मुसलमान हैं. अगर कोई हम पर हमला करने की कोशिश करेगा तो हम उसे गोली से उड़ा देंगे. मैं नेहरू की ये बात सुन कर हक्काबक्का रह गया. दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश के प्रधानमंत्री को ये समझाने में मुझे एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा कि इस तरह के अपराध से निपटने के और भी बेहतर तरीके हैं."

माउंटबेटन को हमेशा इस बात का डर लगा रहता था कि नेहरू का इस तरह का आवेश एक दिन उनकी मौत का कारण बन सकता है. इसलिए उन्होंने इनकी निगरानी के लिए कुछ सैनिक लगा रखे थे.

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