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Fatehpur News: फतेहपुर का ऐसा शिवमंदिर जिसकी खोज क़रीब हज़ार साल पहले गाय चराते हुए एक चरवाहे ने की थी

Fatehpur News: फतेहपुर का ऐसा शिवमंदिर जिसकी खोज क़रीब हज़ार साल पहले गाय चराते हुए एक चरवाहे ने की थी
रुरेश्वर मन्दिर फ़ोटो युगान्तर प्रवाह

Fatehpur News In Hindi

सावन महीने में युगान्तर प्रवाह लेकर आ रहा सावन स्पेशल सीरीज जिसमें आप को मिलेगी शिव मंदिरों की वो अनसुनी व रोचक जानकारियां जो आपने शायद पहले न सुनी या पढ़ी हो. ऐसा ही एक शिव मंदिर है फतेहपुर के गाजीपुर क्षेत्र के चुरियानी गाँव मे स्थित रुरेश्वर धाम शिवमंदिर की माना जाता है कि इस मंदिर की खोज करीब एक हज़ार साल पहले हुई थी, जानिए इसके बारे में

फतेहपुर:हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार सावन का महीना बहुत ही पवित्र व पावन माना जाता है।ऐसी मान्यता है कि सावन माह में भगवान शंकर की पूजा करने से मनुष्य को विशेष पुण्य लाभ की प्राप्ति होती है।शिव मंदिरों में सावन माह में श्रद्धालुओं की भीड़ इकट्ठा रहती है खासकर सावन के सोमवार को तो मंदिरों व शिवालयों में भारी भीड़ पूजा पाठ करने के लिए इक्क्ठा होती है।

जिले भर में अलग अलग क्षेत्रों में कई शिवमन्दिर हैं जिनमे भगवान शंकर की पाताली मूर्ति स्थापित हैं।ऐसा ही एक मंदिर गाजीपुर क्षेत्र के चुरियानी गाँव मे स्थित है जिसे रुरेश्वर धाम के नाम से जाना जाता है।

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वैसे तो पूरे साल श्रद्धालुओं की भीड़ इस मन्दिर में बनी रहती है लेक़िन सावन माह क्षेत्र भर से लोग इस मन्दिर में भगवान शिव का दर्शन करने के लिए जाते है।

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क्या है मन्दिर का इतिहास...

फतेहपुर से गाजीपुर को जाने वाली मुख्य सड़क पर स्थित चुरियानी गाँव में रुरेश्वर धाम मन्दिर है।यह मंदिर गाँव के बाहर एक ऊंचे टीले में स्थित होने के कारण रुरेश्वर के नाम से जाना जाता है।मन्दिर के विषय मे क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि इस मंदिर में स्थापित भगवान शिव के प्रतीक शिवलिंग की खोज क़रीब एक हज़ार वर्ष पूर्व हुई थी।

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शिवलिंग की खोज को लेकर लोंगो ने बताया कि पड़ोसी गाँव फुलवामऊ में रहने वाले एक वैश्य(बनिया) अपनी गाय को इसी क्षेत्र में चरा रहा था और एक दिन जब उसने घास काटने से पहले अपने हंसिये में धार लगाने के लिए एक पत्थर में रगड़ा तो देखा पत्थर शिवलिंग के आकार का है लेक़िन उस वक्त तक उसे शिवलिंग का आभास नहीं हुआ।

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लेक़िन जब वह वापस अपने घर पहुंचकर रात में सोया तो उसे सपना हुआ कि जिस पत्थर पर उसने अपने हंसिये को रगड़कर धार लगाई है वह भगवान शिव की पाताली मूर्ति है।इसके बाद जब वह सुबह जगा तो उसने अपने सपने के बारे में आस पास के गाँव वालों को बताया।जिसके बाद सभी लोग उस टीले पर पहुंचे और उस स्थान की खुदाई की काफ़ी गहरी खुदाई करने के बावजूद भी उस शिवलिंग नुमा पत्थर का कोई अंत नहीं मिला।

जिसके बाद सभी को विश्वास हो गया कि यह भगवान शिव का प्रतीक पाताली शिवलिंग है।और फिर सभी लोग उस स्थान में पहुंच पूजा पाठ करने लगे।चुरियानी गाँव के लोगों का कहना है कि सच्चे मन से इस मंदिर में पूजा करने वाले लोगों की हर मनोकामना को भगवान शिव पूर्ण करते हैं।

मन्दिर में होते हैं हर वर्ष धार्मिक आयोजन..

रुरेश्वर धाम मन्दिर में प्रतिवर्ष गुरुपूर्णिमा के अवसर पर भंडारे का आयोजन होता है।साथ ही वसंत पंचमी के अवसर पर तीन दिनों तक मन्दिर में वसन्तोत्सव मनाया जाता है जिसमें एक भारी मेले का आयोजन भी होता है।

प्रसिद्ध संत ब्रह्मलीन मूलानंद महाराज का है समाधि स्थल...

रुरेश्वर धाम के अंदर धीरे धीरे कई मंदिरों की स्थापना हो गई।प्रसिद्ध संत मूलानंद जी महाराज की तपोस्थली भी रुरेश्वर धाम रहा है और जब वह ब्रह्मलीन हुए तो लोगों ने रुरेश्वर धाम में ही समाधि स्थल बना।

03 Aug 2024 By Vishwa Deepak Awasthi

Fatehpur News: फतेहपुर का ऐसा शिवमंदिर जिसकी खोज क़रीब हज़ार साल पहले गाय चराते हुए एक चरवाहे ने की थी

Fatehpur News In Hindi

फतेहपुर:हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार सावन का महीना बहुत ही पवित्र व पावन माना जाता है।ऐसी मान्यता है कि सावन माह में भगवान शंकर की पूजा करने से मनुष्य को विशेष पुण्य लाभ की प्राप्ति होती है।शिव मंदिरों में सावन माह में श्रद्धालुओं की भीड़ इकट्ठा रहती है खासकर सावन के सोमवार को तो मंदिरों व शिवालयों में भारी भीड़ पूजा पाठ करने के लिए इक्क्ठा होती है।

जिले भर में अलग अलग क्षेत्रों में कई शिवमन्दिर हैं जिनमे भगवान शंकर की पाताली मूर्ति स्थापित हैं।ऐसा ही एक मंदिर गाजीपुर क्षेत्र के चुरियानी गाँव मे स्थित है जिसे रुरेश्वर धाम के नाम से जाना जाता है।

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वैसे तो पूरे साल श्रद्धालुओं की भीड़ इस मन्दिर में बनी रहती है लेक़िन सावन माह क्षेत्र भर से लोग इस मन्दिर में भगवान शिव का दर्शन करने के लिए जाते है।

क्या है मन्दिर का इतिहास...

फतेहपुर से गाजीपुर को जाने वाली मुख्य सड़क पर स्थित चुरियानी गाँव में रुरेश्वर धाम मन्दिर है।यह मंदिर गाँव के बाहर एक ऊंचे टीले में स्थित होने के कारण रुरेश्वर के नाम से जाना जाता है।मन्दिर के विषय मे क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि इस मंदिर में स्थापित भगवान शिव के प्रतीक शिवलिंग की खोज क़रीब एक हज़ार वर्ष पूर्व हुई थी।

शिवलिंग की खोज को लेकर लोंगो ने बताया कि पड़ोसी गाँव फुलवामऊ में रहने वाले एक वैश्य(बनिया) अपनी गाय को इसी क्षेत्र में चरा रहा था और एक दिन जब उसने घास काटने से पहले अपने हंसिये में धार लगाने के लिए एक पत्थर में रगड़ा तो देखा पत्थर शिवलिंग के आकार का है लेक़िन उस वक्त तक उसे शिवलिंग का आभास नहीं हुआ।

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लेक़िन जब वह वापस अपने घर पहुंचकर रात में सोया तो उसे सपना हुआ कि जिस पत्थर पर उसने अपने हंसिये को रगड़कर धार लगाई है वह भगवान शिव की पाताली मूर्ति है।इसके बाद जब वह सुबह जगा तो उसने अपने सपने के बारे में आस पास के गाँव वालों को बताया।जिसके बाद सभी लोग उस टीले पर पहुंचे और उस स्थान की खुदाई की काफ़ी गहरी खुदाई करने के बावजूद भी उस शिवलिंग नुमा पत्थर का कोई अंत नहीं मिला।

जिसके बाद सभी को विश्वास हो गया कि यह भगवान शिव का प्रतीक पाताली शिवलिंग है।और फिर सभी लोग उस स्थान में पहुंच पूजा पाठ करने लगे।चुरियानी गाँव के लोगों का कहना है कि सच्चे मन से इस मंदिर में पूजा करने वाले लोगों की हर मनोकामना को भगवान शिव पूर्ण करते हैं।

मन्दिर में होते हैं हर वर्ष धार्मिक आयोजन..

रुरेश्वर धाम मन्दिर में प्रतिवर्ष गुरुपूर्णिमा के अवसर पर भंडारे का आयोजन होता है।साथ ही वसंत पंचमी के अवसर पर तीन दिनों तक मन्दिर में वसन्तोत्सव मनाया जाता है जिसमें एक भारी मेले का आयोजन भी होता है।

प्रसिद्ध संत ब्रह्मलीन मूलानंद महाराज का है समाधि स्थल...

रुरेश्वर धाम के अंदर धीरे धीरे कई मंदिरों की स्थापना हो गई।प्रसिद्ध संत मूलानंद जी महाराज की तपोस्थली भी रुरेश्वर धाम रहा है और जब वह ब्रह्मलीन हुए तो लोगों ने रुरेश्वर धाम में ही समाधि स्थल बना।

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