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लॉकडाउन:मजदूरों का मिक्सर मशीन में छिपकर जाना..सरकारों की निष्ठा पर प्रश्नचिन्ह लगाता है..!

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इंदौर में एक मिक्सर मशीन के अंदर बैठकर महाराष्ट्र से लखनऊ जा रहे प्रवासी मजदूरों को पुलिस ने पकड़ा है..पढ़े युगान्तर प्रवाह की एक रिपोर्ट।

डेस्क:कोरोना वायरस के चलते सरकार ने पूरे देश में एक साथ लॉकडाउन लगा दिया।जो कि बेहद ज़रूरी कदम था।लेकिन इस लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों की जो दुर्गति हुई है उसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है!

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जिन तरीकों से मजदूरों ने पलायन किया वो सरकारों की निष्ठा पर सवालिया निशान लगाता है।इस लॉकडाउन में हजारों की तादाद में मजदूरों ने सैकड़ो किलोमीटर की यात्रा पैदल ही की है।सैकड़ो साइकिल या किसी तरह जुगाड़ के साधनों से ही अपने अपने घरों के लिए निकल पड़े।

सरकारें भले ही इन प्रवासी मजदूरों से जहां हैं वहीं रुकने की अपीले करती रहीं।लेकिन भोजन और रहने का उचित इंतजाम न होने से भूखों मरने से अच्छा है किसी तरह अपने घर पहुँचे की सोच ने मजदूरों को पलायन के लिए मजबूर कर दिया।

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शनिवार को इंदौर-उज्जैन सीमा के पंथपिपलाई बॉर्डर पर एक मिक्सर में 18 मज़दूर छिपकर महाराष्ट्र से लखनऊ जा रहे थे।चेकिंग के दौरान पुलिस ने उन्हें पकड़ा।lockdown mixer migrant worker

दरअसल चेकिंग में लगे पुलिसवालों ने एक मिक्सर मशीन को रोका, गाड़ी रोकते ही ड्राइवर घबरा गया।इस पर पुलिस को आशंका हुई।चालक से पूछने पर उसने कोई जवाब नहीं दिया।इसके बाद मिक्सर मशीन को चेक किया तो भीतर से कुछ आवाज आ रही थी।

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इसके बाद पुलिस ने मशीन का ढक्कन खुलवाया तो उसके भीतर मजदूर बैठे नजर आए।सभी को एक एक कर नीचे उतारा गया। मिक्सर मशीन में सवार होकर ये लोग महाराष्ट्र से लखनऊ तक जा रहे थे। पुलिस ने मामले की सूचना तत्काल प्रशासन को दी।जिसके बाद सभी मजदूरों को वहीं क्वारण्टाइन किया गया है।

यहाँ उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों द्वारा प्रवासी मजदूरों को वापस लाने का काम शुरू कर दिया गया है।इसके लिए कुछ स्पेशल ट्रेनें व बसें चलाई जा रही हैं।

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लेकिन सवाल इस बात का है कि इस लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों की जो दुर्गति हुई है और अभी भी विकट परिस्थितियों से वो गुज़र रहे हैं।तो क्या लॉकडाउन लगाने से पहले केंद्र सरकार ने इन मजदूरों के विषय में चिंता नहीं की थी।जबकि केंद्र द्वारा अब तक लॉकडाउन को दो बार बढ़ाया जा चुका है।इस दरम्यान भी इतना समय तो सरकार के पास था ही कि इन प्रवासी मजदूरों को वापस घर भेजने की कोई योजना बना ली जाती!


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