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Kushmanda Devi Temple: कानपुर में माँ के चतुर्थ स्वरूप 'कुष्मांडा' देवी के करें दर्शन! माँ की पिंडी रूपी प्रतिमा से रिसता रहता है जल, रोगों से मिलती है मुक्ति

Kushmanda Devi Temple: कानपुर में माँ के चतुर्थ स्वरूप 'कुष्मांडा' देवी के करें दर्शन! माँ की पिंडी रूपी प्रतिमा से रिसता रहता है जल, रोगों से मिलती है मुक्ति
कानपुर में माँ कुष्माण्डा देवी मंदिर के करें दर्शन, फोटो साभार सोशल मीडिया

Kushmanda Devi Temple: शारदीय नवरात्रि का चौथा दिन माता कुष्मांडा को समर्पित है. चतुर्थ दिन मां कुष्मांडा देवी के पूजन का विशेष महत्व है. कहा जाता है कि जब सृष्टि पर अंधकार था, तब माता ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी. मां कुष्मांडा को सूर्य के समान तीव्र माना गया है, क्योंकि वह सूर्य मंडल के भीतर वास करती है. मां दुर्गा के नौ स्वरूपों में से चतुर्थ स्वरूप मां कुष्मांडा देवी का है, कानपुर के घाटमपुर में भी प्रसिद्ध कुष्मांडा देवी का प्रसिद्ध मंदिर है, जिसकी अद्धभुत और चमत्कारी मान्


हाईलाइट्स

  • शारदीय नवरात्रि का चौथा दिन, माँ कुष्मांडा देवी के करे दर्शन और पूजन
  • कानपुर के घाटमपुर तहसील में है माता कुष्मांडा देवी का प्रसिद्ध मंदिर
  • पिंडी रूपी प्रतिमा से रिसता है जल, नेत्र रोग होते है दूर

Visit Maa Kushmanda Devi the fourth form of Mata today : नवरात्रि का आज चौथा दिन है ऐसे में हमारी टीम आप सभी को हर दिन माता के 9 स्वरूपों के दर्शन और उनके पौराणिक महत्व के बारे में बता रहे हैं, आज माता के चतुर्थ स्वरूप कुष्मांडा देवी का दिन है आज के दिन विधि विधान से कुष्मांडा मां के दर्शन करें और विधि विधान से पूजन करें , जिससे माँ प्रसन्न होती है और भक्तों पर कृपा करती है, कानपुर के घाटमपुर में मां कुष्मांडा देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर भी है चलिए इसके पौराणिक महत्व और इतिहास के बारे में आपको बताते हैं.

माँ के चतुर्थ स्वरूप के करें आज दर्शन

आदिशक्ति के चतुर्थ स्वरूप माता कूष्मांडा के दर्शन का बड़ा महत्व है माता रोगों का नाश करती हैं. मां कूष्मांडा का मंदिर उत्तर भारत के कानपुर के घाटमपुर तहसील में स्थित है, आम दिनों में यहां पर भक्तों की भीड़ बनी रहती है लेकिन नवरात्रि के दिनों में यहां पर दूर-दराज, प्रदेश व जिलों से भक्तों का सैलाब उमड़ता है, यह मंदिर काफी प्राचीन है मंदिर में माता की जो पिंडी रूप में प्रतिमा है वह लेटी हुई है, जिससे बराबर जल रिसता रहता है. 

पिंडी रूपी प्रतिमा से रिसता है जल नेत्र रोग होते हैं दूर

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ऐसी मान्यता है कि इस जल को नेत्रों में लगाने से सभी प्रकार के नेत्र रोग से छुटकारा मिल जाता है. इसी के पास एक तालाब भी है जो आज तक सूखा नहीं है, तालाब का जल लेकर माता को अर्पित करते हैं. जल आखिर आता कहां से है कोई भी इस बात का पता आजतक नहीं लग सका. इस मंदिर से लोगों की विशेष गहरी और अटूट आस्था जुडी हुई है. मां के दर्शन के लिए नवरात्रि में देर रात से ही भक्तों की मिल उमड़ पड़ती है अष्टमी के दिन यहां पर दीपदान का कार्यक्रम भी आयोजित किया जाता है.

मंद मुस्कान से ब्रह्मांड को किया उतपन्न

मां दुर्गा के नौ स्वरूपों में से एक स्वरूप चतुर्थ स्वरूप मां कुष्मांडा देवी को कहा जाता है. कुष्मांडा देवी ऐसा बताया जाता है कि जब सृष्टि में अंधकार छाया हुआ था तब माता की मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना हुई थी, माता कुष्मांडा को सूर्य के समान तीव्र माना गया है क्योंकि उनका वास सूर्य मंडल के भीतर है. आठ भुजाओं के कारण अष्टभुजा कहलाई, इनके 7 हाथों में विभिन्न प्रकार के अस्त्र - शस्त्र यानी कमंडल,धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत कलश,चक्र और गदा है, 8वें हाथ मे सर्वसिद्धि और सर्वनिधि देने वाली जप माला है.

एक कथा है प्रचलित

घाटमपुर स्थित कुष्मांडा मन्दिर के पीछे एक कथा भी प्रचलित है, कहा जाता है कि प्राचीन काल में एक कुढहा नाम का ग्वाला गाय चराने जाता था लेकिन वह हर दिन परेशान होता था कि गाय से आखिर दूध क्यों नहीं निकलता है जब जानकारी की गई तो ग्वाला गाय के पीछे गया जहां देखा कि गाय झाड़ियों में दूध अपना गिरा देती थी.

ग्वाले ने साफ सफाई कराई तो वहां पर एक पिंडी स्वरूप में माता की लेटी प्रतिमा निकली, जिसके बाद उसने वहां चबूतरा बनवा दिया. तब देवी को कुढहा देवी के नाम से जाना जाने लगा, ग्वाले के सपने में मां आई उन्होंने कहा कि मैं कुष्मांडा हूं, तभी से मां को कुष्मांडा देवी के नाम से जाना जाने लगा.

मराठा शैली में बना है मन्दिर

मराठा शैली में बने मंदिर की मूर्तियाें को इतिहासकार दूसरी से दसवीं शताब्दी के मध्य की मानते हैं, यहां के राजा घाटमपुर दर्शन ने पहली बार 1380 में मंदिर की नींव रखी और उनके नाम पर नगर का नामकरण हुआ था, इसके बाद ग्वाले को सपना आने पर 1890 में व्यापारी चंदीदीन भुर्जी ने मंदिर का निर्माण करवाया था.

पूजन के बाद मालपुए का लगाये भोग

सुबह स्नान ध्यान कर माता कुष्मांडा की आराधना करें,' ॐ कुष्माण्डा दैव्येनमः' का 108 पर जप करें, मां कुष्मांडा को हरी इलायची , सौंफ और कुम्हड़ा अर्पित करें , कुम्हड़ा माता को अति प्रिय भी है, इसके साथ ही भोग के लिए मालपुआ का माता को भोग लगाए, भोग लगाने के बाद खुद भी प्रसाद के रूप में ग्रहण करें और दूसरों को वितरित करें ऐसा करने से माँ प्रसन्न होती है और भक्तों पर कृपा करती है, जिससे आपका बुद्ध भी मजबूत होगा और आप सुख समृद्धि से सम्पन्न रहेंगे.

18 Oct 2023 By Vishal Shukla

Kushmanda Devi Temple: कानपुर में माँ के चतुर्थ स्वरूप 'कुष्मांडा' देवी के करें दर्शन! माँ की पिंडी रूपी प्रतिमा से रिसता रहता है जल, रोगों से मिलती है मुक्ति


हाईलाइट्स

  • शारदीय नवरात्रि का चौथा दिन, माँ कुष्मांडा देवी के करे दर्शन और पूजन
  • कानपुर के घाटमपुर तहसील में है माता कुष्मांडा देवी का प्रसिद्ध मंदिर
  • पिंडी रूपी प्रतिमा से रिसता है जल, नेत्र रोग होते है दूर

Visit Maa Kushmanda Devi the fourth form of Mata today : नवरात्रि का आज चौथा दिन है ऐसे में हमारी टीम आप सभी को हर दिन माता के 9 स्वरूपों के दर्शन और उनके पौराणिक महत्व के बारे में बता रहे हैं, आज माता के चतुर्थ स्वरूप कुष्मांडा देवी का दिन है आज के दिन विधि विधान से कुष्मांडा मां के दर्शन करें और विधि विधान से पूजन करें , जिससे माँ प्रसन्न होती है और भक्तों पर कृपा करती है, कानपुर के घाटमपुर में मां कुष्मांडा देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर भी है चलिए इसके पौराणिक महत्व और इतिहास के बारे में आपको बताते हैं.

माँ के चतुर्थ स्वरूप के करें आज दर्शन

आदिशक्ति के चतुर्थ स्वरूप माता कूष्मांडा के दर्शन का बड़ा महत्व है माता रोगों का नाश करती हैं. मां कूष्मांडा का मंदिर उत्तर भारत के कानपुर के घाटमपुर तहसील में स्थित है, आम दिनों में यहां पर भक्तों की भीड़ बनी रहती है लेकिन नवरात्रि के दिनों में यहां पर दूर-दराज, प्रदेश व जिलों से भक्तों का सैलाब उमड़ता है, यह मंदिर काफी प्राचीन है मंदिर में माता की जो पिंडी रूप में प्रतिमा है वह लेटी हुई है, जिससे बराबर जल रिसता रहता है. 

पिंडी रूपी प्रतिमा से रिसता है जल नेत्र रोग होते हैं दूर

ऐसी मान्यता है कि इस जल को नेत्रों में लगाने से सभी प्रकार के नेत्र रोग से छुटकारा मिल जाता है. इसी के पास एक तालाब भी है जो आज तक सूखा नहीं है, तालाब का जल लेकर माता को अर्पित करते हैं. जल आखिर आता कहां से है कोई भी इस बात का पता आजतक नहीं लग सका. इस मंदिर से लोगों की विशेष गहरी और अटूट आस्था जुडी हुई है. मां के दर्शन के लिए नवरात्रि में देर रात से ही भक्तों की मिल उमड़ पड़ती है अष्टमी के दिन यहां पर दीपदान का कार्यक्रम भी आयोजित किया जाता है.

मंद मुस्कान से ब्रह्मांड को किया उतपन्न

मां दुर्गा के नौ स्वरूपों में से एक स्वरूप चतुर्थ स्वरूप मां कुष्मांडा देवी को कहा जाता है. कुष्मांडा देवी ऐसा बताया जाता है कि जब सृष्टि में अंधकार छाया हुआ था तब माता की मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना हुई थी, माता कुष्मांडा को सूर्य के समान तीव्र माना गया है क्योंकि उनका वास सूर्य मंडल के भीतर है. आठ भुजाओं के कारण अष्टभुजा कहलाई, इनके 7 हाथों में विभिन्न प्रकार के अस्त्र - शस्त्र यानी कमंडल,धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत कलश,चक्र और गदा है, 8वें हाथ मे सर्वसिद्धि और सर्वनिधि देने वाली जप माला है.

एक कथा है प्रचलित

घाटमपुर स्थित कुष्मांडा मन्दिर के पीछे एक कथा भी प्रचलित है, कहा जाता है कि प्राचीन काल में एक कुढहा नाम का ग्वाला गाय चराने जाता था लेकिन वह हर दिन परेशान होता था कि गाय से आखिर दूध क्यों नहीं निकलता है जब जानकारी की गई तो ग्वाला गाय के पीछे गया जहां देखा कि गाय झाड़ियों में दूध अपना गिरा देती थी.

ग्वाले ने साफ सफाई कराई तो वहां पर एक पिंडी स्वरूप में माता की लेटी प्रतिमा निकली, जिसके बाद उसने वहां चबूतरा बनवा दिया. तब देवी को कुढहा देवी के नाम से जाना जाने लगा, ग्वाले के सपने में मां आई उन्होंने कहा कि मैं कुष्मांडा हूं, तभी से मां को कुष्मांडा देवी के नाम से जाना जाने लगा.

मराठा शैली में बना है मन्दिर

मराठा शैली में बने मंदिर की मूर्तियाें को इतिहासकार दूसरी से दसवीं शताब्दी के मध्य की मानते हैं, यहां के राजा घाटमपुर दर्शन ने पहली बार 1380 में मंदिर की नींव रखी और उनके नाम पर नगर का नामकरण हुआ था, इसके बाद ग्वाले को सपना आने पर 1890 में व्यापारी चंदीदीन भुर्जी ने मंदिर का निर्माण करवाया था.

पूजन के बाद मालपुए का लगाये भोग

सुबह स्नान ध्यान कर माता कुष्मांडा की आराधना करें,' ॐ कुष्माण्डा दैव्येनमः' का 108 पर जप करें, मां कुष्मांडा को हरी इलायची , सौंफ और कुम्हड़ा अर्पित करें , कुम्हड़ा माता को अति प्रिय भी है, इसके साथ ही भोग के लिए मालपुआ का माता को भोग लगाए, भोग लगाने के बाद खुद भी प्रसाद के रूप में ग्रहण करें और दूसरों को वितरित करें ऐसा करने से माँ प्रसन्न होती है और भक्तों पर कृपा करती है, जिससे आपका बुद्ध भी मजबूत होगा और आप सुख समृद्धि से सम्पन्न रहेंगे.

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