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Mahalaxmi Mandir Kolhapur: जानिए कोल्हापुर के इस सिद्ध शक्तिपीठ का पौराणिक महत्व ! असुर के नाम से पड़ा था स्थान का नाम

Mahalaxmi Mandir Kolhapur: जानिए कोल्हापुर के इस सिद्ध शक्तिपीठ का पौराणिक महत्व ! असुर के नाम से पड़ा था स्थान का नाम
कोल्हापुर महालक्ष्मी अंबाबाई मंदिर : फोटो साभार सोशल मीडिया

Ambabai Temple Kolhapur: माँ दुर्गा के कई स्वरूप वाले मन्दिर देश व विदेशों में भी हैं, महाराष्ट्र के कोल्हापुर में भी एक शक्तिपीठ है, 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ कोल्हापुर में भी हैं, यहां देवी सती के त्रिनेत्र गिरे थे तबसे यह शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है. इस मंदिर को महालक्ष्मी या अंबाबाई मन्दिर कहा जाता है.


हाईलाइट्स

  • महाराष्ट्र के कोल्हापुर में सिद्ध शक्तिपीठ महालक्ष्मी मंदिर के दर्शन का है विशेष महत्व
  • 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ है, असुर के नाम से पड़ा जगह का नाम
  • सूर्य की किरणें माता की प्रतिमा पर पड़ती हैं, दर्शन करने मात्र से भक्तों की मनोकामना होती है पूर्ण

Shaktipeeth is Mahalaxmi temple in Kolhapur : शारदीय नवरात्रि के पावन दिनों में माँ दुर्गा के पूजन का विशेष महत्व है, माँ आदिशक्ति सब पर कृपा करती हैं, यह दिन भक्ति और साधना के हैं, माँ की आराधना और भक्ति करना विशेष फलदायी है. महाराष्ट्र के कोल्हापुर में साक्षात माता लक्ष्मी का वास है. जानिए कोल्हा किसके नाम पर पड़ा और इस मंदिर के दर्शन की क्या विशेषता और क्या पौराणिक महत्व है.

कोल्हापुर में महालक्ष्मी मन्दिर है शक्तिपीठ

शारदीय नवरात्रि प्रारम्भ है, 9 दिनों में माता के अलग स्वरूपों के पूजन का दिन है, वहीं देश और विदेशों में माता के शक्तिपीठ है, माता सती के मृत देह के अंग जिस जगह पर गिरे थे, वो एक सिद्ध और दिव्य शक्तिपीठ बन गए. इन शक्तिपीठों में दूर-दराज से भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं, महाराष्ट्र के कोल्हापुर में भी एक शक्तिपीठ है, इस शक्तिपीठ को महालक्ष्मी मंदिर कहा जाता है यह 51 शक्तिपीठों में एक और संख्या की बात करें तो 18 वां शक्तिपीठ है, यहां माता सती के त्रिनेत्र गिरे थे, तबसे यह शक्तिपीठ बन गया.

अम्बाबाई मन्दिर कहा जाता है

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इस मंदिर का निर्माण 7वीं शताब्‍दी में चालुक्य वंश के राजा ने कराया,  माता लक्ष्मी की प्रतिमा जो स्थापित है वह लगभग 7,000 वर्ष पुरानी है.

इस मंदिर का निर्माण हेमाडपंथी शैली के अनुसार किया गया, गर्भ गृह में कमल के पुष्प के ऊपर चार भुजाओं वाले रुप में खड़ी हुई माता लक्ष्मी की मूर्ति विराजमान हैं. पीछे एक श्रीयंत्र भी स्थापित है.उत्तर व दक्षिण मंदिरों में महाकाली और सरस्वती माँ विराजमान हैं. महालक्ष्मी मंदिर को अंबाबाई मन्दिर भी कहते हैं. इस मंदिर के अन्दर नवग्रहों सहित, भगवान सूर्य, महिषासुर मर्दिनी, विट्टल रखमाई, शिवजी, विष्णु, तुलजा भवानी कई देवी देवताओं के भी पूजा स्थल हैं ,इसके साथ ही मन्दिर के आंगन में मणिकर्णिका कुंड पर विश्वेश्वर महादेव मंदिर भी है.

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मन्दिर और स्थान से जुड़ी कथाएं भी है प्रचलित

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इस मंदिर से जुड़ी एक कथा भी है, ऐसा बताया जाता है कि केशी असुर के पुत्र कोल्हासुर ने आतंक मचा रखा था उसके अत्याचारों से हर कोई डरा हुआ रहता. फिर देवताओं ने मां आदिशक्ति से उसका संहार करने का आग्रह किया, तब महालक्ष्मी ने देवी दुर्गा के स्वरूप में आकर ब्रह्मास्त्र के एक ही वार से उस असुर का सिर धड़ से अलग कर दिया था, ऐसा बताया जाता है कि मरने से पहले कोल्हासुर ने महालक्ष्मी से वरदान मांगा कि इस स्थान को उसके नाम से जोड़ा जाए, असुर के मरणोपरांत ही इस स्थान का नाम कोल्हापुर पड़ गया.

सूर्य की किरणें करती हैं आराधना, माता हो गयी थी रूष्ट

इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां पर देवी लक्ष्मी की आराधना सूर्य की किरणें करती हैं, ऐसा भी आया है कि माता लक्ष्मी श्री हरि से किसी बात पर रूठकर कोल्हापुर आ गयी, उन्हें यह स्थान अच्छा लगा तो यही वास करने लगीं, भक्तों की भारी भीड़ यहां दर्शन के लिए उमड़ती है. फिर हर साल भगवान वेंकटेश्वर माता लक्ष्मी को मनाने पहुंचते है, और मान्यता है कि तिरुपति से एक विशेष शॉल उपहार स्वरूप भेजते हैं, जिसे माता लक्ष्मी दीपावली के दिन धारण करती हैं.

16 Oct 2023 By Vishal Shukla

Mahalaxmi Mandir Kolhapur: जानिए कोल्हापुर के इस सिद्ध शक्तिपीठ का पौराणिक महत्व ! असुर के नाम से पड़ा था स्थान का नाम


हाईलाइट्स

  • महाराष्ट्र के कोल्हापुर में सिद्ध शक्तिपीठ महालक्ष्मी मंदिर के दर्शन का है विशेष महत्व
  • 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ है, असुर के नाम से पड़ा जगह का नाम
  • सूर्य की किरणें माता की प्रतिमा पर पड़ती हैं, दर्शन करने मात्र से भक्तों की मनोकामना होती है पूर्ण

Shaktipeeth is Mahalaxmi temple in Kolhapur : शारदीय नवरात्रि के पावन दिनों में माँ दुर्गा के पूजन का विशेष महत्व है, माँ आदिशक्ति सब पर कृपा करती हैं, यह दिन भक्ति और साधना के हैं, माँ की आराधना और भक्ति करना विशेष फलदायी है. महाराष्ट्र के कोल्हापुर में साक्षात माता लक्ष्मी का वास है. जानिए कोल्हा किसके नाम पर पड़ा और इस मंदिर के दर्शन की क्या विशेषता और क्या पौराणिक महत्व है.

कोल्हापुर में महालक्ष्मी मन्दिर है शक्तिपीठ

शारदीय नवरात्रि प्रारम्भ है, 9 दिनों में माता के अलग स्वरूपों के पूजन का दिन है, वहीं देश और विदेशों में माता के शक्तिपीठ है, माता सती के मृत देह के अंग जिस जगह पर गिरे थे, वो एक सिद्ध और दिव्य शक्तिपीठ बन गए. इन शक्तिपीठों में दूर-दराज से भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं, महाराष्ट्र के कोल्हापुर में भी एक शक्तिपीठ है, इस शक्तिपीठ को महालक्ष्मी मंदिर कहा जाता है यह 51 शक्तिपीठों में एक और संख्या की बात करें तो 18 वां शक्तिपीठ है, यहां माता सती के त्रिनेत्र गिरे थे, तबसे यह शक्तिपीठ बन गया.

अम्बाबाई मन्दिर कहा जाता है

इस मंदिर का निर्माण 7वीं शताब्‍दी में चालुक्य वंश के राजा ने कराया,  माता लक्ष्मी की प्रतिमा जो स्थापित है वह लगभग 7,000 वर्ष पुरानी है.

इस मंदिर का निर्माण हेमाडपंथी शैली के अनुसार किया गया, गर्भ गृह में कमल के पुष्प के ऊपर चार भुजाओं वाले रुप में खड़ी हुई माता लक्ष्मी की मूर्ति विराजमान हैं. पीछे एक श्रीयंत्र भी स्थापित है.उत्तर व दक्षिण मंदिरों में महाकाली और सरस्वती माँ विराजमान हैं. महालक्ष्मी मंदिर को अंबाबाई मन्दिर भी कहते हैं. इस मंदिर के अन्दर नवग्रहों सहित, भगवान सूर्य, महिषासुर मर्दिनी, विट्टल रखमाई, शिवजी, विष्णु, तुलजा भवानी कई देवी देवताओं के भी पूजा स्थल हैं ,इसके साथ ही मन्दिर के आंगन में मणिकर्णिका कुंड पर विश्वेश्वर महादेव मंदिर भी है.

मन्दिर और स्थान से जुड़ी कथाएं भी है प्रचलित

इस मंदिर से जुड़ी एक कथा भी है, ऐसा बताया जाता है कि केशी असुर के पुत्र कोल्हासुर ने आतंक मचा रखा था उसके अत्याचारों से हर कोई डरा हुआ रहता. फिर देवताओं ने मां आदिशक्ति से उसका संहार करने का आग्रह किया, तब महालक्ष्मी ने देवी दुर्गा के स्वरूप में आकर ब्रह्मास्त्र के एक ही वार से उस असुर का सिर धड़ से अलग कर दिया था, ऐसा बताया जाता है कि मरने से पहले कोल्हासुर ने महालक्ष्मी से वरदान मांगा कि इस स्थान को उसके नाम से जोड़ा जाए, असुर के मरणोपरांत ही इस स्थान का नाम कोल्हापुर पड़ गया.

सूर्य की किरणें करती हैं आराधना, माता हो गयी थी रूष्ट

इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां पर देवी लक्ष्मी की आराधना सूर्य की किरणें करती हैं, ऐसा भी आया है कि माता लक्ष्मी श्री हरि से किसी बात पर रूठकर कोल्हापुर आ गयी, उन्हें यह स्थान अच्छा लगा तो यही वास करने लगीं, भक्तों की भारी भीड़ यहां दर्शन के लिए उमड़ती है. फिर हर साल भगवान वेंकटेश्वर माता लक्ष्मी को मनाने पहुंचते है, और मान्यता है कि तिरुपति से एक विशेष शॉल उपहार स्वरूप भेजते हैं, जिसे माता लक्ष्मी दीपावली के दिन धारण करती हैं.

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