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विश्व हिंदी दिवस विशेष:हिंदी परचम आज बुलंदी पर-पूतू!

विश्व हिंदी दिवस विशेष:हिंदी परचम आज बुलंदी पर-पूतू!

दस जनवरी को हर साल विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है।इस अवसर पर हिंदी भाषा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण व रोचक तथ्यों की जानकारी पढें युगान्तर पर...

डेस्क:किसी भी देश की भाषा उस देश की संस्कृति संवाहिका होती है, जिसमें उस देश की अस्मिता निहित होती है । समृद्ध भाषा समृद्ध इतिहास की द्योतक है । हिन्दी भाषा हमारे देश के गौरवशाली अतीत को अपने अंक में समेटे हुए है । यह भाषा मात्र नहीं है अपितु सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तनों को प्रतिबिम्बित करने वाला दर्पण है । संवैैधानिक रूप से 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी भाषा को भारत की राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की गई किंतु इससे पूर्व हिन्दी मातृभाषा, जनपदी क्षेत्रीय भाषा, साहित्यिक भाषा और संपर्क भाषा के रूप में प्रचलित थी । हिन्दी भाषा में रामचरितमानस अमूल्य रत्न है जो किसी भी अन्य देश के साहित्य में मिलना दुर्लभ है । (world hindi day)

आज हिन्दी वैश्विक परिधि को लाँघकर संपूर्ण संसार में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है । विश्व में केवल हिन्दी बोली ही नहीं जाती अपितु उसमें निरंतर अनुसंधान भी जारी हैं, इस समय भारत के अतिरिक्त विश्व के 176 उच्च शिक्षण संस्थानों में हिन्दी का अध्ययन-अध्यापन हो रहा है जिसमें 30 अमेरिकी विश्वविद्यालय हैं । विश्वव्यापी सर्वेक्षणों के अनुसार विश्व की विभिन्न प्रमुख भाषाओं की सांख्यिकीय स्थिति कुछ इस प्रकार है-फ्रेंच 1%, अरबी 1.5%, रुसी 2.5%, अंग्रेजी व स्पेनी 5%,चीनी (मंदारिन)13%,हिंदी 18%। भारतवर्ष में हिंदी का सर्वाधिक विशाल जनाधार है और संपूर्ण देश में लगभग 80% भारतीय जनसमुदाय हिन्दी बोल व समझ सकता है ।

हिन्दी को वैश्विक स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाने के उद्देश्य से पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी से 14 जनवरी 1975 तक नागपुर में आयोजित किया गया था । इस सम्मेलन का आयोजन राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के तत्वावधान में हुआ था । सम्मेलन से सम्बन्धित राष्ट्रीय आयोजन समिति के अध्यक्ष तत्कालीन उपराष्ट्रपति जी थे । राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अध्यक्ष श्री मधुकर राव चौधरी उस समय महाराष्ट्र के वित्त, नियोजन व अल्पबचत मन्त्री थे । पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन का बोधवाक्य 'वसुधैव कुटुम्बकम' था । सम्मेलन के मुख्य अतिथि मॉरीशस के प्रधानमन्त्री श्री शिवसागर रामगुलाम जी थे । प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में 30 देशों के कुल 122 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। इस सम्मेलन में पारित किए गए प्रस्ताव में तीन बिंदु प्रमुख थे-

1.संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिलाया जाए ।
2.वर्धा में विश्व हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना होनी चाहिए।
3- विश्व हिन्दी सम्मेलनों को स्थायित्व प्रदान करने के लिये अत्यन्त विचारपूर्वक एक योजना बनायी जाए ।
प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजन की यादों को अक्षुण्ण रखने के लिए 2006 में भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी  को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी । उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी 2006 को पहली बार विश्व हिंदी दिवस मनाया था । विश्व हिन्दी दिवस मनाने के कई लक्ष्य हैं जिसमें हिन्दी का सार्वभौमिक प्रचार-प्रसार करना, हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रस्तुत करना, हिन्दी के प्रति लगाव उत्पन्न करना आदि प्रमुख हैं ।
आज का युग तकनीक का है, ऐसे में हिन्दी को वैश्विक स्तर पर ले जाने में अंतर्जाल का महत्वपूर्ण योगदान है । गूगल की मानें तो हिन्दी में इंटरनेट पर सामग्री पढ़ने वाले प्रतिवर्ष 94 फीसदी बढ़ रहे हैं जबकि अंग्रेजी में यह दर हर वर्ष 17 फीसदी घट रही है। गूगल के अनुसार 2021 तक इंटरनेट पर 20.1 करोड़ लोग हिन्दी का उपयोग करने लगेंगे । हिन्दी को विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार विश्व की 10 शक्तिशाली भाषाओं में से एक स्वीकार किया गया है । भारत के लगभग 60 करोड़ लोग हिन्दी भाषा बोलते हैं जिसमें 26 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिन्दी है ।

इस तरह विश्व हिंदी दिवस हिन्दी भाषा और साहित्य की वैश्विक समृद्धता को परिलक्षित एवं रेखांकित करने का दिन है । हिन्दी बस हिंदुस्तान की नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व की भाषा है । इस दिवस को सफल बनाने में विश्व के कोने-कोने में बसे प्रवासी भारतीयों का महत्वपूर्ण योगदान है जिन्होंने विदेश में भी रहकर हिन्दी को अपनाकर स्वयं को जड़ों से संबद्ध किए हुए हैं ।

(लेखक पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू' जगद्गुरू रामभद्राचार्य विश्वविद्यालय चित्रकूट में असिटेंट प्रोफेसर(हिंदी) हैं।)

10 Jan 2020 By Shubham Mishra

विश्व हिंदी दिवस विशेष:हिंदी परचम आज बुलंदी पर-पूतू!

डेस्क:किसी भी देश की भाषा उस देश की संस्कृति संवाहिका होती है, जिसमें उस देश की अस्मिता निहित होती है । समृद्ध भाषा समृद्ध इतिहास की द्योतक है । हिन्दी भाषा हमारे देश के गौरवशाली अतीत को अपने अंक में समेटे हुए है । यह भाषा मात्र नहीं है अपितु सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तनों को प्रतिबिम्बित करने वाला दर्पण है । संवैैधानिक रूप से 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी भाषा को भारत की राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की गई किंतु इससे पूर्व हिन्दी मातृभाषा, जनपदी क्षेत्रीय भाषा, साहित्यिक भाषा और संपर्क भाषा के रूप में प्रचलित थी । हिन्दी भाषा में रामचरितमानस अमूल्य रत्न है जो किसी भी अन्य देश के साहित्य में मिलना दुर्लभ है । (world hindi day)

आज हिन्दी वैश्विक परिधि को लाँघकर संपूर्ण संसार में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है । विश्व में केवल हिन्दी बोली ही नहीं जाती अपितु उसमें निरंतर अनुसंधान भी जारी हैं, इस समय भारत के अतिरिक्त विश्व के 176 उच्च शिक्षण संस्थानों में हिन्दी का अध्ययन-अध्यापन हो रहा है जिसमें 30 अमेरिकी विश्वविद्यालय हैं । विश्वव्यापी सर्वेक्षणों के अनुसार विश्व की विभिन्न प्रमुख भाषाओं की सांख्यिकीय स्थिति कुछ इस प्रकार है-फ्रेंच 1%, अरबी 1.5%, रुसी 2.5%, अंग्रेजी व स्पेनी 5%,चीनी (मंदारिन)13%,हिंदी 18%। भारतवर्ष में हिंदी का सर्वाधिक विशाल जनाधार है और संपूर्ण देश में लगभग 80% भारतीय जनसमुदाय हिन्दी बोल व समझ सकता है ।

हिन्दी को वैश्विक स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाने के उद्देश्य से पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी से 14 जनवरी 1975 तक नागपुर में आयोजित किया गया था । इस सम्मेलन का आयोजन राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के तत्वावधान में हुआ था । सम्मेलन से सम्बन्धित राष्ट्रीय आयोजन समिति के अध्यक्ष तत्कालीन उपराष्ट्रपति जी थे । राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अध्यक्ष श्री मधुकर राव चौधरी उस समय महाराष्ट्र के वित्त, नियोजन व अल्पबचत मन्त्री थे । पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन का बोधवाक्य 'वसुधैव कुटुम्बकम' था । सम्मेलन के मुख्य अतिथि मॉरीशस के प्रधानमन्त्री श्री शिवसागर रामगुलाम जी थे । प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में 30 देशों के कुल 122 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। इस सम्मेलन में पारित किए गए प्रस्ताव में तीन बिंदु प्रमुख थे-

1.संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिलाया जाए ।
2.वर्धा में विश्व हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना होनी चाहिए।
3- विश्व हिन्दी सम्मेलनों को स्थायित्व प्रदान करने के लिये अत्यन्त विचारपूर्वक एक योजना बनायी जाए ।
प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजन की यादों को अक्षुण्ण रखने के लिए 2006 में भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी  को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी । उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी 2006 को पहली बार विश्व हिंदी दिवस मनाया था । विश्व हिन्दी दिवस मनाने के कई लक्ष्य हैं जिसमें हिन्दी का सार्वभौमिक प्रचार-प्रसार करना, हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रस्तुत करना, हिन्दी के प्रति लगाव उत्पन्न करना आदि प्रमुख हैं ।
आज का युग तकनीक का है, ऐसे में हिन्दी को वैश्विक स्तर पर ले जाने में अंतर्जाल का महत्वपूर्ण योगदान है । गूगल की मानें तो हिन्दी में इंटरनेट पर सामग्री पढ़ने वाले प्रतिवर्ष 94 फीसदी बढ़ रहे हैं जबकि अंग्रेजी में यह दर हर वर्ष 17 फीसदी घट रही है। गूगल के अनुसार 2021 तक इंटरनेट पर 20.1 करोड़ लोग हिन्दी का उपयोग करने लगेंगे । हिन्दी को विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार विश्व की 10 शक्तिशाली भाषाओं में से एक स्वीकार किया गया है । भारत के लगभग 60 करोड़ लोग हिन्दी भाषा बोलते हैं जिसमें 26 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिन्दी है ।

इस तरह विश्व हिंदी दिवस हिन्दी भाषा और साहित्य की वैश्विक समृद्धता को परिलक्षित एवं रेखांकित करने का दिन है । हिन्दी बस हिंदुस्तान की नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व की भाषा है । इस दिवस को सफल बनाने में विश्व के कोने-कोने में बसे प्रवासी भारतीयों का महत्वपूर्ण योगदान है जिन्होंने विदेश में भी रहकर हिन्दी को अपनाकर स्वयं को जड़ों से संबद्ध किए हुए हैं ।

(लेखक पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू' जगद्गुरू रामभद्राचार्य विश्वविद्यालय चित्रकूट में असिटेंट प्रोफेसर(हिंदी) हैं।)

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